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Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 7

191 Sukta
13 Mantra
1/142/7
Devata- उषासानक्ता Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ भन्द॑माने॒ उपा॑के॒ नक्तो॒षासा॑ सु॒पेश॑सा। य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ मा॒तरा॒ सीद॑तां ब॒र्हिरा सु॒मत् ॥

आ । भन्द॑माने॒ इति॑ । उपा॑के॒ इति॑ । नक्तो॒षसा॑ । सु॒ऽपेष॑सा । य॒ह्वी इति॑ । ऋ॒तस्य॑ । मा॒तरा॑ । सीद॑ताम् । ब॒र्हिः । आ । सु॒ऽमत् ॥

Mantra without Swara
आ भन्दमाने उपाके नक्तोषासा सुपेशसा। यह्वी ऋतस्य मातरा सीदतां बर्हिरा सुमत् ॥

आ। भन्दमाने इति। उपाके इति। नक्तोषसा। सुऽपेषसा। यह्वी इति। ऋतस्य। मातरा। सीदताम्। बर्हिः। आ। सुऽमत् ॥ १.१४२.७

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! आप जैसे (ऋतस्य) सत्य व्यवहार का (मातरा) मान करानेवाली (यह्वी) कारण से उत्पन्न हुई (उपाके) एक दूसरे के साथ वर्त्तमान (सुपेशसा) उत्तम रूपयुक्त और (भन्दमाने) कल्याण करनेवाली (नक्तोषसा) रात्रि और प्रभात वेला (आ, सीदताम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होवें वैसे (आ, सुमत्) जिसमें बहुत आनन्द को प्राप्त होते हैं उस (बर्हिः) उत्तम घर को प्राप्त होओ ॥ ७ ॥
Essence
जैसे दिन-रात्रि समस्त प्राणी-अप्राणी को नियम से अपनी-अपनी क्रियाओं में प्रवृत्त कराता है, वैसे सब विद्वानों को सर्वसाधारण मनुष्य उत्तम क्रियाओं में प्रवृत्त करने चाहिये ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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