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Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 6

191 Sukta
13 Mantra
1/142/6
Devata- देव्योद्वारः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वि श्र॑यन्तामृता॒वृध॑: प्र॒यै दे॒वेभ्यो॑ म॒हीः। पा॒व॒कास॑: पुरु॒स्पृहो॒ द्वारो॑ दे॒वीर॑स॒श्चत॑: ॥

वि । श्र॒य॒न्ता॒म् । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । प्र॒ऽयै । दे॒वेऽभ्यः॑ । म॒हीः । पा॒व॒कासः॑ । पु॒रु॒ऽस्पृहः॑ । द्वारः॑ । दे॒वीः । अ॒स॒श्चतः॑ ॥

Mantra without Swara
वि श्रयन्तामृतावृध: प्रयै देवेभ्यो महीः। पावकास: पुरुस्पृहो द्वारो देवीरसश्चत: ॥

वि। श्रयन्ताम्। ऋतऽवृधः। प्रऽयै। देवेऽभ्यः। महीः। पावकासः। पुरुऽस्पृहः। द्वारः। देवीः। असश्चतः ॥ १.१४२.६

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये जो (पावकासः) पवित्र करनेवाली (ऋतावृधः) सत्य आचरण और उत्तम ज्ञान से बढ़ाई हुई (पुरुस्पृहः) बहुतों से चाहीं जातीं (द्वारः) द्वारों के समान (देवीः) मनोहर (असश्चतः) परस्पर एक दूसरे से विलक्षण (महीः) प्रशंसनीय वाणी वा पृथिवी जिनकी (प्रयै) प्रीति के लिये विद्वान् जन कामना करते उनका आप लोग (विश्रयन्ताम्) विशेषता से आश्रय करें ॥ ६ ॥
Essence
मनुष्यों को सबके उपकार के लिये विद्या और अच्छी शिक्षायुक्त वाणी और रत्नों को प्रसिद्ध करनेवाली भूमियों की कामना करनी चाहिये और उनके आश्रय से पवित्रता संपादन करनी चाहिये ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।