Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 5

191 Sukta
13 Mantra
1/142/5
Devata- बर्हिः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स्तृ॒णा॒नासो॑ य॒तस्रु॑चो ब॒र्हिर्य॒ज्ञे स्व॑ध्व॒रे। वृ॒ञ्जे दे॒वव्य॑चस्तम॒मिन्द्रा॑य॒ शर्म॑ स॒प्रथ॑: ॥

स्तृ॒णा॒नासः॑ । य॒तऽस्रु॑चः । ब॒र्हिः । य॒ज्ञे । सु॒ऽअ॒ध्व॒रे । वृ॒ञ्जे । दे॒वव्य॑चःऽतमम् । इन्द्रा॑य । शर्म॑ । स॒ऽप्रथः॑ ॥

Mantra without Swara
स्तृणानासो यतस्रुचो बर्हिर्यज्ञे स्वध्वरे। वृञ्जे देवव्यचस्तममिन्द्राय शर्म सप्रथ: ॥

स्तृणानासः। यतऽस्रुचः। बर्हिः। यज्ञे। सुऽअध्वरे। वृञ्जे। देवव्यचःऽतमम्। इन्द्राय। शर्म। सऽप्रथः ॥ १.१४२.५

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 5

Bhashya

More bhashyas
Meaning
जो (स्वध्वरे) उत्तम शोभायुक्त (यज्ञे) विद्यादानरूप यज्ञ में (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य के लिये (सप्रथः) प्रख्यात गुणों के साथ वर्त्तमान (बर्हिः) बड़े (देवव्यचस्तमम्) विद्वानों से अतीव व्याप्त (शर्म) घर को (स्तृणानासः) ढाँपते हुए (यतस्रुचः) उद्यम को प्राप्त होते हैं, वे दुःख और दरिद्रपन का (वृञ्जे) त्याग कर देते हैं ॥ ५ ॥
Essence
उद्यम करनेवालों के विना लक्ष्मी और राज्य श्री प्राप्त नहीं होती तथा जो अतीव उत्तम विद्वानों के निवास संयुक्त घर में अच्छे प्रकार वसते हैं, वे अविद्या और दरिद्रता को निरन्तर नष्ट करते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.