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Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 13

191 Sukta
13 Mantra
1/142/13
Devata- इन्द्र: Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स्वाहा॑कृता॒न्या ग॒ह्युप॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। इन्द्रा ग॑हि श्रु॒धी हवं॒ त्वां ह॑वन्ते अध्व॒रे ॥

स्वाहा॑ऽकृतानि । आ । ग॒हि॒ । उप॑ । ह॒व्यानि॑ । वी॒तये॑ । इन्द्र॑ । आ । ग॒हि॒ । श्रु॒धि । हव॑म् । त्वाम् । ह॒व॒न्ते॒ । अ॒ध्व॒रे ॥

Mantra without Swara
स्वाहाकृतान्या गह्युप हव्यानि वीतये। इन्द्रा गहि श्रुधी हवं त्वां हवन्ते अध्वरे ॥

स्वाहाऽकृतानि। आ। गहि। उप। हव्यानि। वीतये। इन्द्र। आ। गहि। श्रुधि। हवम्। त्वाम्। हवन्ते। अध्वरे ॥ १.१४२.१३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 7

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्य को युक्त करनेवाले विद्वान् ! आप (अध्वरे) न नष्ट करने योग्य व्यवहार में (वीतये) विद्या की प्राप्ति के लिये (स्वाहाकृतानि) सत्य क्रिया से (हव्यानि) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को (उपागहि) प्राप्त होओ, जिन (त्वाम्) तुम्हारी (हवन्ते) विद्या का ज्ञान चाहते हुए विद्यार्थी जन स्तुति करते हैं सो आप (आ, गहि) आओ और (हवम्) स्तुति को (श्रुधि) सुनो ॥ १३ ॥
Essence
अध्यापक जितना शास्त्र विद्यार्थियों को पढ़ावे उसकी प्रतिदिन वा प्रतिमास परीक्षा करे और विद्यार्थियों में जो जिनको विद्या देवें वे उनकी तन, मन, धन से सेवा करें ॥ १३ ॥इस सूक्त में पढ़ने-पढ़ानेवालों के गुणों और विद्या की प्रशंसा होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये ॥यह एकसौ बयालीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।