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Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 12

191 Sukta
13 Mantra
1/142/12
Devata- स्वाहा कृतिः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पू॒ष॒ण्वते॑ म॒रुत्व॑ते वि॒श्वदे॑वाय वा॒यवे॑। स्वाहा॑ गाय॒त्रवे॑पसे ह॒व्यमिन्द्रा॑य कर्तन ॥

पू॒ष॒ण्ऽवते॑ । म॒रुत्व॑ते । वि॒श्वऽदे॑वाय । वा॒यवे॑ । स्वाहा॑ । गा॒य॒त्रऽवे॑पसे । ह॒व्यम् । इन्द्रा॑य । क॒र्त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
पूषण्वते मरुत्वते विश्वदेवाय वायवे। स्वाहा गायत्रवेपसे हव्यमिन्द्राय कर्तन ॥

पूषण्ऽवते। मरुत्वते। विश्वऽदेवाय। वायवे। स्वाहा। गायत्रऽवेपसे। हव्यम्। इन्द्राय। कर्तन ॥ १.१४२.१२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (स्वाहा) सत्य क्रिया से (पूषण्वते) जिसके बहुत पुष्टि करनेवाले गुण (मरुत्वते) जिसमें प्रशंसायुक्त विद्या की स्तुति करनेवाले (विश्वदेवाय) वा समस्त विद्वान् जन विद्यमान (वायवे) प्राप्त होने योग्य (गायत्रवेपसे) गानेवाले की रक्षा करता हुआ जिनसे रूप प्रकट होता उस (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिये (हव्यम्) ग्रहण करने योग्य कर्म को (कर्त्तन) करो ॥ १२ ॥
Essence
जिस धन से पुष्टि, विद्या विद्वानों का सत्कार, वेदविद्या की प्रवृत्ति और सर्वोपकार हो वही धर्म सम्बन्धी धन है, और नहीं ॥ १२ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।