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Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 11

191 Sukta
13 Mantra
1/142/11
Devata- वनस्पतिः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒व॒सृ॒जन्नुप॒ त्मना॑ दे॒वान्य॑क्षि वनस्पते। अ॒ग्निर्ह॒व्या सु॑षूदति दे॒वो दे॒वेषु॒ मेधि॑रः ॥

अ॒व॒ऽसृ॒जन् । उप॑ । त्मना॑ । दे॒वान् । य॒क्षि॒ । व॒न॒स्प॒ते॒ । अ॒ग्निः । ह॒व्या । सु॒सू॒द॒ति॒ । दे॒वः । दे॒वेषु॑ । मेधि॑रः ॥

Mantra without Swara
अवसृजन्नुप त्मना देवान्यक्षि वनस्पते। अग्निर्हव्या सुषूदति देवो देवेषु मेधिरः ॥

अवऽसृजन्। उप। त्मना। देवान्। यक्षि। वनस्पते। अग्निः। हव्या। सुसूदति। देवः। देवेषु। मेधिरः ॥ १.१४२.११

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (वनस्पते) रश्मियों के पति सूर्य्य के समान वर्त्तमान ! आप जिस कारण (त्मना) आत्मा से (देवान्) विद्या की कामना करते हुओं को (उपावसृजन्) अपने समीप नाना प्रकार की विद्या से परिपूरित करते हुए (देवेषु) प्रकाशमान लोकों में (देवः) अत्यन्त दीपते हुए (मेधिरः) सङ्ग करानेवाले (अग्निः) जैसे अग्नि (हव्या) होम से देने योग्य पदार्थों को (सुषूदति) सुन्दरता से ग्रहण कर परमाणुरूप करता है वैसे विद्या का (यक्षि) सङ्ग करते हो। इससे सत्कार करने योग्य हो ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्यमण्डल पृथिवी आदि दिव्य पदार्थों में दिव्यरूप हुआ जल को वर्षाता है, वैसे विद्वान् जन संसार में विद्यार्थियों में विद्या की वर्षा करावें ॥ ११ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।