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Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 10

191 Sukta
13 Mantra
1/142/10
Devata- त्वष्टा Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तन्न॑स्तु॒रीप॒मद्भु॑तं पु॒रु वारं॑ पु॒रु त्मना॑। त्वष्टा॒ पोषा॑य॒ वि ष्य॑तु रा॒ये नाभा॑ नो अस्म॒युः ॥

तत् । नः॒ । तु॒रीप॑म् । अद्भु॑तम् । पु॒रु । वा॒ । अर॑म् । त्मना॑ । त्वष्टा॑ । पोषा॑य । वि । स्य॒तु॒ । रा॒ये । नाभा॑ । नः॒ । अ॒स्म॒ऽयुः ॥

Mantra without Swara
तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरु वारं पुरु त्मना। त्वष्टा पोषाय वि ष्यतु राये नाभा नो अस्मयुः ॥

तत्। नः। तुरीपम्। अद्भुतम्। पुरु। वा। अरम्। त्मना। त्वष्टा। पोषाय। वि। स्यतु। राये। नाभा। नः। अस्मऽयुः ॥ १.१४२.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वान् ! (अस्मयुः) हम लोगों की कामना करनेवाले (त्वष्टा) विद्या और धर्म से प्रकाशमान आप (नः) हम लोगों के (पुरु) बहुत (पोषाय) पोषण करने के लिये और (राये) धन होने के लिये (नाभा) नाभि में प्राण के समान (वि, ष्यतु) प्राप्त होवें और (त्मना) आत्मा से जो (तुरीपम्) तुरन्त रक्षा करनेवाला (अद्भुतम्) अद्भुत आश्चर्य्यरूप (पुरु, वा, अरम्) बहुत वा पूरा धन है (तत्) उसको (नः) हम लोगों के लिये प्राप्त कीजिये (=कराइये) ॥ १० ॥
Essence
जो विद्वान् हम लोगों की कामना करे उसकी हम लोग भी कामना करें। जो हम लोगों की कामना न करे उसकी हम भी कामना न करें, इससे परस्पर विद्या और सुख की कामना करते हुए आचार्य्य और विद्यार्थी लोग विद्या की उन्नति करें ॥ १० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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