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Rigveda Mandal 1 / Sukta 142 / Mantra 1

191 Sukta
13 Mantra
1/142/1
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
समि॑द्धो अग्न॒ आ व॑ह दे॒वाँ अ॒द्य य॒तस्रु॑चे। तन्तुं॑ तनुष्व पू॒र्व्यं सु॒तसो॑माय दा॒शुषे॑ ॥

सम्ऽइ॑द्धः । अ॒ग्ने॒ । आ । व॒ह॒ । दे॒वान् । अ॒द्य । य॒तऽस्रु॑चे । तन्तु॑म् । त॒नु॒ष्व॒ । पू॒र्व्यम् । सु॒तऽसो॑माय । दा॒शुषे॑ ॥

Mantra without Swara
समिद्धो अग्न आ वह देवाँ अद्य यतस्रुचे। तन्तुं तनुष्व पूर्व्यं सुतसोमाय दाशुषे ॥

सम्ऽइद्धः। अग्ने। आ। वह। देवान्। अद्य। यतऽस्रुचे। तन्तुम्। तनुष्व। पूर्व्यम्। सुतऽसोमाय। दाशुषे ॥ १.१४२.१

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 10 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) पावक के समान उत्तम प्रकाशवाले (समिद्धः) विद्या से प्रकाशित पढ़ानेवाले विद्वन् ! आप (अद्य) आज के दिन (सुतसोमाय) जिसने बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस निकाले और (यतस्रुचे) यज्ञपात्र उठाये हैं, उस यज्ञ करनेवाले (दाशुषे) दानशील जन के लिये (देवान्) विद्वानों की (आ, वह) प्राप्ति करो और (पूर्व्यम्) प्राचीनों के किये हुए (तन्तुम्) विस्तार को (तनुष्व) विस्तारो ॥ १ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बालकपन और तरुण अवस्था में माता और पिता आदि सन्तानों को सुखी करें, वैसे पुत्रलोग ब्रह्मचर्य से विद्या को पढ़ युवावस्था को प्राप्त और विवाह किये हुए अपने माता-पिता आदि को आनन्द देवें ॥ १ ॥
Subject
अब तेरह ऋचावाले एकसौ ब्यालीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अध्यापक और अध्येता के विषय को कहते हैं ।