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Rigveda Mandal 1 / Sukta 141 / Mantra 3

191 Sukta
13 Mantra
1/141/3
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
निर्यदीं॑ बु॒ध्नान्म॑हि॒षस्य॒ वर्प॑स ईशा॒नास॒: शव॑सा॒ क्रन्त॑ सू॒रय॑:। यदी॒मनु॑ प्र॒दिवो॒ मध्व॑ आध॒वे गुहा॒ सन्तं॑ मात॒रिश्वा॑ मथा॒यति॑ ॥

निः । यत् । ई॒म् । बु॒ध्नात् । म॒हि॒षस्य॑ । वर्प॑सः । ई॒शा॒नासः॑ । शव॑सा । क्रन्त॑ । सू॒रयः॑ । यत् । ई॒म् । अनु॑ । प्र॒ऽदिवः॑ । मध्वः॑ । आ॒ऽध॒वे । गुहा॑ । सन्त॑म् । मा॒त॒रिश्वा॑ । म॒था॒यति॑ ॥

Mantra without Swara
निर्यदीं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानास: शवसा क्रन्त सूरय:। यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहा सन्तं मातरिश्वा मथायति ॥

निः। यत्। ईम्। बुध्नात्। महिषस्य। वर्पसः। ईशानासः। शवसा। क्रन्त। सूरयः। यत्। ईम्। अनु। प्रऽदिवः। मध्वः। आऽधवे। गुहा। सन्तम्। मातरिश्वा। मथायति ॥ १.१४१.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (ईशानासः) ऐश्वर्ययुक्त (सूरयः) विद्वान् जन (शवसा) बल से जैसे (आधवे) सब ओर से अन्न आदि के अलग करने के निमित्त (मातरिश्वा) प्राण वायु जाठराग्नि को (मथायति) मथता है वैसे (महिषस्य) बड़े (वर्पसः) रूप अर्थात् सूर्यमण्डल के सम्बन्ध में स्थित (बुध्नात्) अन्तरिक्ष से (ईम्) इस प्रत्यक्ष व्यवहार को (अनुक्रन्त) अनुक्रम से प्राप्त हों वा (मध्वः) विशेष ज्ञानयुक्त (प्रदिवः) कान्तिमान् आत्मा के (गुहा) गुहाशय में अर्थात् बुद्धि में (सन्तम्) वर्त्तमान (ईम्) प्रत्यक्ष (यत्) जिस ज्ञान को (निष्क्रन्त) निरन्तर क्रम से प्राप्त हों, उससे वे सुखी होते हैं ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही ब्रह्मवेत्ता विद्वान् होते हैं, जो धर्मानुष्ठान, योगाभ्यास और सत्सङ्ग करके अपने आत्मा को जान परमात्मा को जानते हैं और वे ही मुमुक्षु जनों के लिये इस ज्ञान को विदित कराने के योग्य होते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।