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Rigveda Mandal 1 / Sukta 141 / Mantra 2

191 Sukta
13 Mantra
1/141/2
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
पृ॒क्षो वपु॑: पितु॒मान्नित्य॒ आ श॑ये द्वि॒तीय॒मा स॒प्तशि॑वासु मा॒तृषु॑। तृ॒तीय॑मस्य वृष॒भस्य॑ दो॒हसे॒ दश॑प्रमतिं जनयन्त॒ योष॑णः ॥

पृ॒क्षः । वपुः॑ । पि॒तु॒ऽमान् । नित्यः॑ । आ । श॒ये॒ । द्वि॒तीय॑म् । आ । स॒प्तऽशि॑वासु । मा॒तृषु॑ । तृ॒तीय॑म् । अ॒स्य॒ । वृ॒ष॒भस्य॑ । दो॒हसे॑ । दश॑ऽप्रमतिम् । ज॒न॒य॒न्त॒ । योष॑णः ॥

Mantra without Swara
पृक्षो वपु: पितुमान्नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु। तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ॥

पृक्षः। वपुः। पितुऽमान्। नित्यः। आ। शये। द्वितीयम्। आ। सप्तऽशिवासु। मातृषु। तृतीयम्। अस्य। वृषभस्य। दोहसे। दशऽप्रमतिम्। जनयन्त। योषणः ॥ १.१४१.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(नित्यः) नित्य (पितुमान्) प्रशंसित अन्नयुक्त मैं पहिले (पृक्षः) पूँछने कहने योग्य (वपुः) सुन्दररूप का (आशये) आशय लेता अर्थात् आश्रित होता हूँ (अस्य) इस (वृषभस्य) यज्ञादि कर्म द्वारा जल वर्षानेवाले का मेरा (द्वितीयम्) दूसरा सुन्दर रूप (सप्तशिवासु) सात प्रकार की कल्याण करने (मातृषु) और मान्य करनेवाले माताओं के समीप (आ) अच्छे प्रकार वर्त्तमान और (तृतीयम्) तीसरा (दशप्रमतिम्) दश प्रकार की उत्तम मति जिसमें होती उस सुन्दर रूप को (दोहसे) कामों की परिपूरणता के लिये (योषणः) प्रत्येक व्यवहारों को मिलानेवाली स्त्री (जनयन्त) प्रकट करती हैं ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य इस जगत् में सात प्रकार के लोकों में ब्रह्मचर्य से प्रथम, गृहाश्रम से दूसरे और वानप्रस्थ वा संन्यास से तीसरे कर्म और उपासना के विज्ञान को प्राप्त होते, वे दश इन्द्रियों, दश प्राणों के विषयक मन बुद्धि चित्त अहङ्कार और जीव के ज्ञान को प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।