Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 141 / Mantra 13

191 Sukta
13 Mantra
1/141/13
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अस्ता॑व्य॒ग्निः शिमी॑वद्भिर॒र्कैः साम्रा॑ज्याय प्रत॒रं दधा॑नः। अ॒मी च॒ ये म॒घवा॑नो व॒यं च॒ मिहं॒ न सूरो॒ अति॒ निष्ट॑तन्युः ॥

अस्ता॑वि । अ॒ग्निः । शिमी॑वत्ऽभिः । अ॒र्कैः । साम्रा॑ज्याय । प्रऽत॒रम् । दधा॑नः । अ॒मी । च॒ । ये । म॒घवा॑नः । व॒यम् । च॒ । मिह॑म् । न । सूरः॑ । अति॑ । निः । त॒न्युः॒ ॥

Mantra without Swara
अस्ताव्यग्निः शिमीवद्भिरर्कैः साम्राज्याय प्रतरं दधानः। अमी च ये मघवानो वयं च मिहं न सूरो अति निष्टतन्युः ॥

अस्तावि। अग्निः। शिमीवत्ऽभिः। अर्कैः। साम्राज्याय। प्रऽतरम्। दधानः। अमी। च। ये। मघवानः। वयम्। च। मिहम्। न। सूरः। अति। निः। तन्युः ॥ १.१४१.१३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 8

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (शिमीवद्भिः) प्रशंसित कर्मों से युक्त (अर्कैः) सत्कार करने योग्य विद्वानों के साथ (प्रतरम्) शत्रुबलों को जिससे तरें उस सेनागण को (दधानः) धारण करता हुआ (अग्निः) सूर्य के समान सुशीलता में प्रकाशित (साम्राज्याय) चक्रवर्त्ति राज्य के लिये (अस्तावि) स्तुति पाता है (च) और (ये) जो (अमी) वे (मघवानः) परमपूजित धनयुक्त जन (सुरः) सूर्य (मिहम्) वर्षा को (न) जैसे वैसे विद्या को (अति, नि, ततन्युः) अतीव निरन्तर विस्तारें उस पूर्वोक्त सज्जन (च) (और) पीछे कहे हुए जनों की (वयम्) हम लोग प्रशंसा करें ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य धार्मिक विद्वानों से अच्छी शिक्षा को पाये हुए धर्म से राज्य का विस्तार करते हुए प्रयत्न करते हैं, वे ही राज्य, विद्या और धर्म के उपदेश में अच्छे प्रकार स्थापन करने योग्य हैं ॥ १३ ॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति वर्त्तमान है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ इकतालीसवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।