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Rigveda Mandal 1 / Sukta 141 / Mantra 11

191 Sukta
13 Mantra
1/141/11
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒स्मे र॒यिं न स्वर्थं॒ दमू॑नसं॒ भगं॒ दक्षं॒ न प॑पृचासि धर्ण॒सिम्। र॒श्मीँरि॑व॒ यो यम॑ति॒ जन्म॑नी उ॒भे दे॒वानां॒ शंस॑मृ॒त आ च॑ सु॒क्रतु॑: ॥

अ॒स्मे इति॑ । र॒यिम् । न । सु॒ऽअर्थ॑म् । दमू॑नसम् । भग॑न् । दक्ष॑म् । न । प॒पृ॒चा॒सि॒ । ध॒र्ण॒सिम् । र॒श्मीन्ऽइ॑व । यः । यम॑ति । जन्म॑नी॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । दे॒वाना॑म् । शंस॑म् । ऋ॒ते । आ । च॒ । सु॒ऽक्रतुः॑ ॥

Mantra without Swara
अस्मे रयिं न स्वर्थं दमूनसं भगं दक्षं न पपृचासि धर्णसिम्। रश्मीँरिव यो यमति जन्मनी उभे देवानां शंसमृत आ च सुक्रतु: ॥

अस्मे इति। रयिम्। न। सुऽअर्थम्। दमूनसम्। भगम्। दक्षम्। न। पपृचासि। धर्णसिम्। रश्मीन्ऽइव। यः। यमति। जन्मनी इति। उभे इति। देवानाम्। शंसम्। ऋते। आ। च। सुऽक्रतुः ॥ १.१४१.११

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सुक्रतुः) उत्तम बुद्धिवाला विद्वान् ! (अस्मे) हम लोगों के लिये (स्वर्थम्) जिससे अच्छा प्रयोजन हो वा जो अनर्थ साधनों से रहित उस (रयिम्) धन के (न) समान (दमूनसम्) इन्द्रियों को विषयों में दबा देने के समानरूप (भगम्) ऐश्वर्य्य का और (दक्षम्) चतुर के (न) समान (धर्णसिम्) धारण करनेवाले का (पपृचासि) सम्बन्ध करता वा (रश्मीरिव) जैसे किरणों को वैसे (ऋते) सत्य व्यवहार में (देवानाम्) विद्वानों के (उभे) दो (जन्मनी) अगले-पिछले जन्म (च) और (शंसम्) प्रशंसा को (यः) जो (आ, यमति) बढ़ता है, वह हमलोगों को सत्कार करने योग्य है ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार हैं। जो सूर्य की किरणों के समान सबको धर्मसम्बन्धी पुरुषार्थ मे संयुक्त करते हैं और आप भी वैसे ही वर्त्तते हैं, वे अगले-पिछले जन्मों को पवित्र करते हैं ॥ ११ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।