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Rigveda Mandal 1 / Sukta 140 / Mantra 9

191 Sukta
13 Mantra
1/140/9
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒धी॒वा॒सं परि॑ मा॒तू रि॒हन्नह॑ तुवि॒ग्रेभि॒: सत्व॑भिर्याति॒ वि ज्रय॑:। वयो॒ दध॑त्प॒द्वते॒ रेरि॑ह॒त्सदानु॒ श्येनी॑ सचते वर्त॒नीरह॑ ॥

अ॒धी॒वा॒सम् । परि॑ । मा॒तुः । रि॒हन् । अह॑ । तु॒वि॒ऽग्रेभिः । सत्व॑ऽभिः । या॒ति॒ । वि । ज्रयः॑ । वयः॑ । दध॑त् । प॒त्ऽवते॑ । रेरि॑हत् । सदा॑ । अनु॑ । श्येनी॑ । स॒च॒ते॒ । व॒र्त॒निः । अह॑ ॥

Mantra without Swara
अधीवासं परि मातू रिहन्नह तुविग्रेभि: सत्वभिर्याति वि ज्रय:। वयो दधत्पद्वते रेरिहत्सदानु श्येनी सचते वर्तनीरह ॥

अधीवासम्। परि। मातुः। रिहन्। अह। तुविऽग्रेभिः। सत्वऽभिः। याति। वि। ज्रयः। वयः। दधत्। पत्ऽवते। रेरिहत्। सदा। अनु। श्येनी। सचते। वर्तनिः। अह ॥ १.१४०.९

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे वीर ! जैसे (ज्रयः) वेगयुक्त अग्नि (मातुः) मान देनेवाली पृथिवी के (अधिवासम्) ऊपर से शरीर को जिससे ढाँपते उस वस्त्र के समान घास आदि को (परि, रिहन्) परित्याग करता हुआ (अह) प्रसिद्ध में (तुविग्रेभिः) बहुत शब्दोंवाले (सत्वभिः) प्राणियों के साथ (वि, याति) विविध प्रकार से प्राप्त होता है और जैसे (वर्त्तनिः) वर्त्तमान (श्येनी) वाज पक्षी की स्त्री वाजिनी (वयः) अवस्था को (दधत्) धारण करती हुई (पद्वते) पगोंवाले द्विपद-चतुष्पद प्राणी के लिये (सचते) प्राप्त होती है वैसे दुष्टों को (अनु, रेरिहत्) अनुक्रम से बार-बार छोड़ते हुए आप (सदा) सदा (अह) ही उनको निग्रह स्थान को पहुँचाओ ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे अग्नि जङ्गलादिकों को जलाता वा पर्वतों को तोड़ता वैसे अन्याय और अधर्मात्माओं की निवृत्ति कर और दुष्टों के अभिमानों को तोड़के सत्य धर्म का तुम प्रचार करो ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।