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Rigveda Mandal 1 / Sukta 140 / Mantra 8

191 Sukta
13 Mantra
1/140/8
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तम॒ग्रुव॑: के॒शिनी॒: सं हि रे॑भि॒र ऊ॒र्ध्वास्त॑स्थुर्म॒म्रुषी॒: प्रायवे॒ पुन॑:। तासां॑ ज॒रां प्र॑मु॒ञ्चन्ने॑ति॒ नान॑द॒दसुं॒ परं॑ ज॒नय॑ञ्जी॒वमस्तृ॑तम् ॥

तम् । अ॒ग्रुवः॑ । के॒शिनीः॑ । सम् । हि । रे॒भि॒रे । ऊ॒र्ध्वाः । त॒स्थुः॒ । म॒म्रुषीः॑ । प्र । आ॒यवे॑ । पुन॒रिति॑ । तासा॑म् । ज॒राम् । प्र॑ऽमु॒ञ्चन् । ए॒ति॒ । नान॑दत् । असु॑म् । पर॑म् । ज॒नय॑न् । जी॒वम् । अस्तृ॑तम् ॥

Mantra without Swara
तमग्रुव: केशिनी: सं हि रेभिर ऊर्ध्वास्तस्थुर्मम्रुषी: प्रायवे पुन:। तासां जरां प्रमुञ्चन्नेति नानददसुं परं जनयञ्जीवमस्तृतम् ॥

तम्। अग्रुवः। केशिनीः। सम्। हि। रेभिरे। ऊर्ध्वाः। तस्थुः। मम्रुषीः। प्र। आयवे। पुनरिति। तासाम्। जराम्। प्रऽमुञ्चन्। एति। नानदत्। असुम्। परम्। जनयन्। जीवम्। अस्तृतम् ॥ १.१४०.८

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अग्रुवः) अग्रगण्य (केशिनीः) प्रशंसनीय केशोंवाली युवावस्था को प्राप्त होती हुई कन्या (तम्) उस विद्वान् पति को (सं, रेभिरे) सुन्दरता से कहती हैं वे (हि) ही (प्रायवे) पठाने अर्थात् दूसरे देश उस पति के पहुँचाने को (मम्रुषीः) मरी सी हों (पुनः) फिर उसीके घर आने समय (ऊर्ध्वाः) ऊँची पदवी पाये हुई सी (तस्थुः) स्थिर होती हैं, जो (अस्तृतम्) नष्ट न किया गया (परम्) सबको इष्ट (असुम्) ऐसे प्राण को वा (जीवम्) जीवात्मा को (नानदत्) निरन्तर रटावे और (तासाम्) उक्त उन कन्याओं के (जराम्) बुढ़ापे को (प्रमुञ्चन्) अच्छे प्रकार छोड़ता और विद्याओं को (जनयन्) उत्पन्न कराता हुआ उत्तम शिक्षाओं का प्रचार कराता है वह उत्तम जन्म (एति) पाता है ॥ ८ ॥
Essence
जो कन्या जन ब्रह्मचर्य्य के साथ समस्त विद्याओं का अभ्यास करती हैं, वे इस संसार में प्रशंसित हो और बहुत सुख भोग जन्मान्तर में भी उत्तम सुख को प्राप्त होती हैं और जो विद्वान् लोग भी शरीर और आत्मा के बल को नष्ट नहीं करते, वे वृद्धावस्था और रोगों से रहित होते हैं ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।