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Rigveda Mandal 1 / Sukta 140 / Mantra 13

191 Sukta
13 Mantra
1/140/13
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒भी नो॑ अग्न उ॒क्थमिज्जु॑गुर्या॒ द्यावा॒क्षामा॒ सिन्ध॑वश्च॒ स्वगू॑र्ताः। गव्यं॒ यव्यं॒ यन्तो॑ दी॒र्घाहेषं॒ वर॑मरु॒ण्यो॑ वरन्त ॥

अ॒भि । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । उ॒क्थम् । इत् । जु॒गु॒र्याः॒ । द्यावा॒क्षामा॑ । सिन्ध॑वः । च॒ । स्वऽगू॑र्ताः । गव्य॑म् । यव्य॑म् । यन्तः॑ । दी॒र्घा । अहा॑ । इष॑म् । वर॑म् । अ॒रु॒ण्यः॑ । व॒र॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
अभी नो अग्न उक्थमिज्जुगुर्या द्यावाक्षामा सिन्धवश्च स्वगूर्ताः। गव्यं यव्यं यन्तो दीर्घाहेषं वरमरुण्यो वरन्त ॥

अभि। नः। अग्ने। उक्थम्। इत्। जुगुर्याः। द्यावाक्षामा। सिन्धवः। च। स्वऽगूर्ताः। गव्यम्। यव्यम्। यन्तः। दीर्घा। अहा। इषम्। वरम्। अरुण्यः। वरन्त ॥ १.१४०.१३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (द्यावाक्षामा) अन्तरिक्ष और भूमि (सिन्धवः) समुद्र और नदी तथा (अरुण्यः) उषःकाल (च) और (वरम्) उत्तम रत्नादि पदार्थ (इषम्) अन्न (उक्थम्) प्रशंसनीय (गव्यम्) गौ का दूध आदि वा (यव्यम्) जौ के होनेवाले खेत को (यन्तः) प्राप्त होते हुए (स्वगूर्त्ताः) अपने अपने स्वाभाविक गुणों से उद्यत (दीर्घा) बहुत (अहा) दिनों को (वरन्त) स्वीकार करें वैसे हे (अग्ने) विद्वान् ! (नः) हम लोगों को (अभि, इत्, जुगुर्याः) सब ओर से उद्यम ही में लगाइये ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को सदा पुरुषार्थी होना चाहिये, जिन यानों से भूमि, अन्तरिक्ष, समुद्र और नदियों में सुख से शीघ्र जाना हो, उन यानों पर चढ़कर प्रतिदिन रात्रि के चौथे प्रहर में उठकर और दिन में न सोयकर सदा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे उद्यमी ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥ १३ ॥इस सूक्त में विद्वानों के पुरुषार्थ और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ चालीसवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।