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Rigveda Mandal 1 / Sukta 140 / Mantra 12

191 Sukta
13 Mantra
1/140/12
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
रथा॑य॒ नाव॑मु॒त नो॑ गृ॒हाय॒ नित्या॑रित्रां प॒द्वतीं॑ रास्यग्ने। अ॒स्माकं॑ वी॒राँ उ॒त नो॑ म॒घोनो॒ जनाँ॑श्च॒ या पा॒रया॒च्छर्म॒ या च॑ ॥

रथा॑य । नाव॑म् । उ॒त । नः॒ । गृ॒हाय॑ । नित्य॑ऽअरित्राम् । प॒त्ऽवती॑म् । रा॒सि॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒स्माक॑म् । वी॒रान् । उ॒त । नः॒ । म॒घोनः॑ । जना॑न् । च॒ । या । पा॒रया॑त् । शर्म॑ । या । च॒ ॥

Mantra without Swara
रथाय नावमुत नो गृहाय नित्यारित्रां पद्वतीं रास्यग्ने। अस्माकं वीराँ उत नो मघोनो जनाँश्च या पारयाच्छर्म या च ॥

रथाय। नावम्। उत। नः। गृहाय। नित्यऽअरित्राम्। पत्ऽवतीम्। रासि। अग्ने। अस्माकम्। वीरान्। उत। नः। मघोनः। जनान्। च। या। पारयात्। शर्म। या। च ॥ १.१४०.१२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) शिल्पविद्या पाये हुए विद्वान् ! आप (या) जो (अस्माकम्) हमारे (वीरान्) वीरों (उत) और भी (मघोनः) धनवान् (जनान्) मनुष्यों और (नः) हम लोगों को (च) भी समुद्र के (पारयात्) पार उतारे (च) और (या) जो हमको (शर्म) सुख को अच्छे प्रकार प्राप्त करे उस (नित्यारित्राम्) नित्य दृढ़ बन्धनयुक्त जल की गहराई की परीक्षा करनेवाले स्तम्भों तथा (पद्वतीम्) पैरों के समान प्रशंसित पहियों से युक्त (नावम्) बड़ी नाव को (नः) हमारे (रथाय) समुद्र आदि में रमण के लिये (उत) वा (गृहाय) घर के लिये (रासि) देते हो ॥ १२ ॥
Essence
विद्वानों को चाहिये कि जैसे मनुष्य और घोड़े आदि पशु पैरों से चलते हैं, वैसे चलनेवाली बड़ी नाव रचके और एक द्वीप से दूसरे द्वीप वा समुद्र में युद्ध अथवा व्यवहार के लिये जाय-आय (=जाना-आना) करके ऐश्वर्य की उन्नति निरन्तर करें ॥ १२ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।