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Rigveda Mandal 1 / Sukta 140 / Mantra 10

191 Sukta
13 Mantra
1/140/10
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्माक॑मग्ने म॒घव॑त्सु दीदि॒ह्यध॒ श्वसी॑वान्वृष॒भो दमू॑नाः। अ॒वास्या॒ शिशु॑मतीरदीदे॒र्वर्मे॑व यु॒त्सु प॑रि॒जर्भु॑राणः ॥

अ॒स्माक॑म् । अ॒ग्ने॒ । म॒घव॑त्ऽसु । दी॒दि॒हि॒ । अध॑ । श्वसी॑वान् । वृ॒ष॒भः । दमू॑नाः । अ॒व॒ऽअस्य॑ । शिशु॑ऽमतीः । अ॒दी॒देः॒ । वर्म॑ऽइव । यु॒त्ऽसु । प॒रि॒ऽजर्भु॑राणः ॥

Mantra without Swara
अस्माकमग्ने मघवत्सु दीदिह्यध श्वसीवान्वृषभो दमूनाः। अवास्या शिशुमतीरदीदेर्वर्मेव युत्सु परिजर्भुराणः ॥

अस्माकम्। अग्ने। मघवत्ऽसु। दीदिहि। अध। श्वसीवान्। वृषभः। दमूनाः। अवऽअस्य। शिशुऽमतीः। अदीदेः। वर्मऽइव। युत्ऽसु। परिऽजर्भुराणः ॥ १.१४०.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) पावक के समान वर्त्तमान विद्वान् ! (वृषभः) श्रेष्ठ (दमूनाः) इन्द्रियों का दमन करनेवाले (श्वसीवान्) प्राणवान् और (परिजर्भुराणः) सब ओर से पुष्ट होते हुए आप (अस्माकम्) हमारे (युत्सु) संग्राम और (मघवत्सु) बहुत हैं धन जिनमें उन घरों वा मित्रवर्गों में (वर्मेव) कवच के समान (शिशुमतीः) प्रशंसित बालकोंवाली स्त्री वा प्रजाओं को (दीदिहि) प्रकाशित करो (अध) इसके अनन्तर दुःखों को (अवास्य) विरुद्धता से दूर पहुँचा सुखों को (अदीदेः) प्रकाशित करो ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् ! संग्राम में जैसे कवच से शरीर संरक्षित किया जाता है, वैसे न्याय से प्रजाजनों की रक्षा कीजिये और युद्ध में स्त्रियों को न मारिये, जैसे धनी पुरुषों की स्त्रियाँ नित्य आनन्द भोगती हैं, वैसे ही प्रजाजनों को आनन्दित कीजिये ॥ १० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।