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Rigveda Mandal 1 / Sukta 14 / Mantra 12

191 Sukta
12 Mantra
1/14/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु॒क्ष्वा ह्यरु॑षी॒ रथे॑ ह॒रितो॑ देव रो॒हितः॑। ताभि॑र्दे॒वाँ इ॒हा व॑ह॥

यु॒क्ष्व । हि । अरु॑षीः । रथे॑ । ह॒रितः॑ । दे॒व॒ । रो॒हितः॑ । ताभिः॑ । दे॒वान् । इ॒ह । आ । व॒ह॒ ॥

Mantra without Swara
युक्ष्वा ह्यरुषी रथे हरितो देव रोहितः। ताभिर्देवाँ इहा वह॥

युक्ष्व। हि। अरुषीः। रथे। हरितः। देव। रोहितः। ताभिः। देवान्। इह। आ। वह॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 27 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देव) विद्वान् मनुष्य ! तू (रथे) पृथिवी समुद्र और अन्तरिक्ष में जाने आने के लिये विमान आदि रथ में (रोहितः) नीची ऊँची जगह उतारने चढ़ाने (हरितः) पदार्थों को हरने (अरुषीः) लाल रंगयुक्त तथा गमन करानेवाली ज्वाला अर्थात् लपटों को (युक्ष्व) युक्त कर और (ताभिः) इनसे (इह) इस संसार में (देवान्) दिव्यक्रियासिद्ध व्यवहारों को (आवह) अच्छी प्रकार प्राप्त कर॥१२॥
Essence
विद्वानों को कला और विमान आदि यानों में अग्नि आदि पदार्थों को संयुक्त करके इनसे संसार में मनुष्यों के सुख के लिये दिव्य पदार्थों का प्रकाश करना चाहिये॥१२॥सब देवों के गुणों के प्रकाश तथा क्रियाओं के समुदाय से इस चौदहवें सूक्त की सङ्गति पूर्वोक्त तेरहवें सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये। इस सूक्त का अर्थ सायणाचार्य्य आदि विद्वान् तथा यूरोपदेशनिवासी विलसन आदि ने विपरीत ही वर्णन किया है॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में भौतिक अग्नि के गुणों का उपदेश किया है-