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Rigveda Mandal 1 / Sukta 14 / Mantra 10

191 Sukta
12 Mantra
1/14/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
विश्वे॑भिः सो॒म्यं मध्वग्न॒ इन्द्रे॑ण वा॒युना॑। पिबा॑ मि॒त्रस्य॒ धाम॑भिः॥

विश्वे॑भिः । सो॒म्यम् । मधु॑ । अग्ने॑ । इन्द्रे॑ण । वा॒युना॑ । पिब॑ । मि॒त्रस्य॑ । धाम॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
विश्वेभिः सोम्यं मध्वग्न इन्द्रेण वायुना। पिबा मित्रस्य धामभिः॥

विश्वेभिः। सोम्यम्। मधु। अग्ने। इन्द्रेण। वायुना। पिब। मित्रस्य। धामऽभिः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 27 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(अग्ने) यह अग्नि (इन्द्रेण) परम ऐश्वर्य करानेवाले (वायुना) स्पर्श वा गमन करनेहारे पवन के और (मित्रस्य) सब में रहने तथा सब के प्राणरूप होकर वर्त्तनेवाले वायु के साथ (विश्वेभिः) सब (धामभिः) स्थानों से (सोम्यम्) सोमसम्पादन के योग्य (मधु) मधुर आदि गुणयुक्त पदार्थ को (पिब) ग्रहण करता है॥१०॥
Essence
यह विद्युद्रूप अग्नि ब्रह्माण्ड में रहनेवाले पवन तथा शरीर में रहनेवाले प्राणों के साथ वर्त्तमान होकर सब पदार्थों से रस को ग्रहण करके उगलता है, इससे यह मुख्य शिल्पविद्या का साधन है॥१०॥
Subject
किसके साथ में यह विद्युत् अग्नि क्रियाओं की सिद्धि करानेवाला होता है, सो अगले मन्त्र में कहा है-