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Rigveda Mandal 1 / Sukta 139 / Mantra 6

191 Sukta
11 Mantra
1/139/6
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- अत्यष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
वृष॑न्निन्द्र वृष॒पाणा॑स॒ इन्द॑व इ॒मे सु॒ता अद्रि॑षुतास उ॒द्भिद॒स्तुभ्यं॑ सु॒तास॑ उ॒द्भिद॑:। ते त्वा॑ मदन्तु दा॒वने॑ म॒हे चि॒त्राय॒ राध॑से। गी॒र्भिर्गि॑र्वाह॒: स्तव॑मान॒ आ ग॑हि सुमृळी॒को न॒ आ ग॑हि ॥

वृष॑न् । इ॒न्द्र॒ । वृ॒ष॒ऽपाना॑सः । इन्द॑वः । इ॒मे । सु॒ताः । अद्रि॑ऽसुतासः । उ॒त्ऽभिदः॑ । तुभ्य॑म् । सु॒तासः॑ । उ॒त्ऽभिदः॑ । ते । त्वा॒ । म॒न्द॒न्तु॒ । दा॒वने॑ । म॒हे । चि॒त्राय॑ । राध॑से । गीः॒ऽभिः । गि॒र्वा॒हः॒ । स्तव॑मानः । आ । ग॒हि॒ । सु॒ऽमृ॒ळी॒कः । नः॒ । आ । ग॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
वृषन्निन्द्र वृषपाणास इन्दव इमे सुता अद्रिषुतास उद्भिदस्तुभ्यं सुतास उद्भिद:। ते त्वा मदन्तु दावने महे चित्राय राधसे। गीर्भिर्गिर्वाह: स्तवमान आ गहि सुमृळीको न आ गहि ॥

वृषन्। इन्द्र। वृषऽपानासः। इन्दवः। इमे। सुताः। अद्रिऽसुतासः। उत्ऽभिदः। तुभ्यम्। सुतासः। उत्ऽभिदः। ते। त्वा। मदन्तु। दावने। महे। चित्राय। राधसे। गीःऽभिः। गिर्वाहः। स्तवमानः। आ। गहि। सुऽमृळीकः। नः। आ। गहि ॥ १.१३९.६

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 1

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Meaning
हे (वृषन्) सेचन समर्थ अति बलवान् (इन्द्रः) परमैश्वर्य्ययुक्त जन ! जो (इमे) ये (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (वृषपाणासः) मेघ जिनसे वर्षते वे वर्षाविन्दु जिनके पान ऐसे (अद्रिषुतासः) जो मेघ से उत्पन्न (उद्भिदः) पृथिवी को विदारण करके प्रसिद्ध होते (इन्दवः) और रसवान् वृक्ष (सुताः) उत्पन्न हुए तथा (उद्भिदः) जो विदारण भाव को प्राप्त अर्थात् कूट-पीट बनाये हुए औषध आदि पदार्थ (सुतासः) उत्पन्न हुए हैं (ते) वे (दावने) सुख देनेवाले (महे) बड़े (चित्राय) अद्भुत (राधसे) धन के लिये (त्वा) आपको (मदन्तु) आनन्दित करें। हे (गिर्वाहः) उपदेशरूपी वाणियों की प्राप्ति करानेहारे आप (गीर्भिः) शास्त्रयुक्त वाणियों से (स्तवमानः) गुणों का कीर्त्तन करते हुए (नः) हम लोगों के प्रति (आ, गहि) आओ तथा (सुमृडीकः) उत्तम सुख देनेवाले होते हुए हम लोगों के प्रति (आ, गहि) आओ ॥ ६ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि उन्हीं ओषधि और औषधिरसों का सेवन करें कि जो प्रमाद न उत्पन्न करें, जिससे ऐश्वर्य्य की उन्नति हो ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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