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Rigveda Mandal 1 / Sukta 139 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/139/10
Devata- बृहस्पतिः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- निचृदत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
होता॑ यक्षद्व॒निनो॑ वन्त॒ वार्यं॒ बृह॒स्पति॑र्यजति वे॒न उ॒क्षभि॑: पुरु॒वारे॑भिरु॒क्षभि॑:। ज॒गृ॒भ्मा दू॒र आ॑दिशं॒ श्लोक॒मद्रे॒रध॒ त्मना॑। अधा॑रयदर॒रिन्दा॑नि सु॒क्रतु॑: पु॒रू सद्मा॑नि सु॒क्रतु॑: ॥

होता॑ । य॒क्ष॒त् । व॒निनः॑ । व॒न्त॒ । वार्य॑म् । बृह॒स्पतिः॑ । य॒ज॒ति॒ । वे॒नः । उ॒क्षऽभिः॑ । पु॒रु॒ऽवारे॑भिः । उ॒क्षऽभिः॑ । ज॒गृ॒म्भ । दू॒रेऽआ॑दिशम् । श्लोक॑म् । अद्रेः॑ । अध॑ । त्मना॑ । अधा॑रयत् । अ॒रि॒रिन्दा॑नि । सु॒ऽक्रतुः॑ । पु॒रु । सद्मा॑नि । सु॒ऽक्रतुः॑ ॥

Mantra without Swara
होता यक्षद्वनिनो वन्त वार्यं बृहस्पतिर्यजति वेन उक्षभि: पुरुवारेभिरुक्षभि:। जगृभ्मा दूर आदिशं श्लोकमद्रेरध त्मना। अधारयदररिन्दानि सुक्रतु: पुरू सद्मानि सुक्रतु: ॥

होता। यक्षत्। वनिनः। वन्त। वार्यम्। बृहस्पतिः। यजति। वेनः। उक्षऽभिः। पुरुऽवारेभिः। उक्षऽभिः। जगृभ्म। दूरेऽआदिशम्। श्लोकम्। अद्रेः। अध। त्मना। अधारयत्। अररिन्दानि। सुऽक्रतुः। पुरु। सद्मानि। सुऽक्रतुः ॥ १.१३९.१०

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 5

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Meaning
(होता) सद्गुणों का ग्रहण करनेवाला जन (पुरुवारेभिः) जिनके स्वीकार करने योग्य गुण हैं उन (उक्षभिः) महात्माजनों के साथ जिस (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य जन का (यक्षत्) सङ्ग कर वा जिनके स्वीकार करने योग्य गुण उन (उक्षभिः) महात्माजनों के साथ वर्त्तमान (वेनः) कामना करने और (बृहस्पतिः) बड़ी वाणी की पालना करनेवाला विद्वान् जिस स्वीकार करने योग्य का (यजति) सङ्ग करता है (सुक्रतुः) सुन्दर बुद्धिवाला जन (त्मना) आपसे जिन (पुरु) बहुत (सद्मानि) प्राप्त होने योग्य पदार्थों को (अधारयत्) धारण करावे वा (सुक्रतुः) उत्तम काम करनेवाला जन (अद्रेः) मेघ से (अररिन्दानि) जलों को जैसे वैसे (दूर आदिशम्) दूर में जो कहा जाय उस विषय और (श्लोकम्) वाणी को धारण करावे उस सबको (वनिनः) प्रशंसनीय विद्या किरणें जिनके विद्यामान हैं वे सज्जन (वन्त) अच्छे प्रकार सेवें, (अध) इसके अनन्तर इस उक्त समस्त विषय को हम लोग भी (जगृभ्म) ग्रहण करें ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मेघ से छुटे हुए जल समस्त प्राणी-अप्राणियों अर्थात् ज़ड़-चेतनों को जिलाते उनकी पालना करते हैं, वैसे वेदादि विद्याओं के पढ़ाने-पढ़नेवालों से प्राप्त हुई विद्या सब मनुष्यों को वृद्धि देती हैं और जैसे महात्मा शास्त्रवेत्ता विद्वानों के साथ सम्बन्ध से सज्जन लोग जानने योग्य विषय को जानते हैं, वैसे विद्या के उत्तम सम्बन्ध से मनुष्य चाहे हुए विषय को प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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