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Rigveda Mandal 1 / Sukta 138 / Mantra 4

191 Sukta
4 Mantra
1/138/4
Devata- पूषा Rishi- परुच्छेपो Chhanda- विराडत्यष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ॒स्या ऊ॒ षु ण॒ उप॑ सा॒तये॑ भु॒वोऽहे॑ळमानो ररि॒वाँ अ॑जाश्व श्रवस्य॒ताम॑जाश्व। ओ षु त्वा॑ ववृतीमहि॒ स्तोमे॑भिर्दस्म सा॒धुभि॑:। न॒हि त्वा॑ पूषन्नति॒मन्य॑ आघृणे॒ न ते॑ स॒ख्यम॑पह्नु॒वे ॥

अ॒स्याः । ऊँ॒ इति॑ । सु । नः॒ । उप॑ । सा॒तये॑ । भु॒वः॒ । अहे॑ळमानः । र॒रि॒ऽवान् । अ॒ज॒ऽअ॒श्व॒ । श्र॒व॒स्य॒ताम् । अ॒ज॒ऽअ॒श्व॒ । ओ इति॑ । सु । त्वा॒ । व॒वृ॒ती॒म॒हि॒ । स्तोमे॑ऽभिः । द॒स्म॒ । सा॒धुऽभिः॑ । न॒हि । त्वा॒ । पू॒ष॒न् । अ॒ति॒ऽमन्ये॑ । आ॒घृ॒णे॒ । न । ते॒ । स॒ख्यम् । अ॒प॒ऽह्नु॒वे ॥

Mantra without Swara
अस्या ऊ षु ण उप सातये भुवोऽहेळमानो ररिवाँ अजाश्व श्रवस्यतामजाश्व। ओ षु त्वा ववृतीमहि स्तोमेभिर्दस्म साधुभि:। नहि त्वा पूषन्नतिमन्य आघृणे न ते सख्यमपह्नुवे ॥

अस्याः। ऊँ इति। सु। नः। उप। सातये। भुवः। अहेळमानः। ररिऽवान्। अजऽअश्व। श्रवस्यताम्। अजऽअश्व। ओ इति। सु। त्वा। ववृतीमहि। स्तोमेऽभिः। दस्म। साधुऽभिः। नहि। त्वा। पूषन्। अतिऽमन्ये। आघृणे। न। ते। सख्यम्। अपऽह्नुवे ॥ १.१३८.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पूषन्) पुष्टि करनेवाले ! (अजाश्व) जिनके छेरी और घोड़े विद्यमान हैं ऐसे (श्रवस्यताम्) अपने को धन चाहनेवालों में (अजाश्व) जिनकी छेरी घोड़ों के तुल्य उनके समान हे विद्वन् ! आप (नः) हमारे लिये (अस्याः) इस उत्तम बुद्धि के (सातये) बाँटने को (ररिवान्) देनेवाले और (अहेडमानः) सत्कारयुक्त (सूप, भुवः) उत्तमता से समीप में हूजिये, हे (आघृणे) सब ओर से प्रकाशमान पुष्टि करनेवाले पुरुष ! मैं (ते) आपके (सख्यम्) मित्रपन और मित्रता के काम को (न)(अपह्नुवे) छिपाऊँ (त्वा) आपका (नहि, अतिमन्ये) अत्यन्त मान्य न करूँ किन्तु यथायोग्य आपको मानूँ (उ) और (ओ) हे (दस्म) दुःख मिटानेवाले (स्तोमेभिः) स्तुतियों से युक्त (साधुभिः) सज्जनों के साथ वर्त्तमान हम लोग (त्वा) आपको (सु, ववृतीमहि) अच्छे प्रकार निरन्तर वर्त्तें अर्थात् आपके अनुकूल रहें ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। धार्मिक विद्वानों के साथ सिद्ध मित्रभाव को वर्त्त कर सब मनुष्यों को चाहिये कि बहुत प्रकार की उत्तम-उत्तम बुद्धियों को प्राप्त होवें और कभी किसी शिष्ट पुरुष का तिरस्कार न करें ॥ ४ ॥ इस सूक्त में पुष्टि करनेवाले विद्वान् वा धार्मिक सामान्य जन की प्रशंसा के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ अड़तीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।