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Rigveda Mandal 1 / Sukta 137 / Mantra 2

191 Sukta
3 Mantra
1/137/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒म आ या॑त॒मिन्द॑व॒: सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः सु॒तासो॒ दध्या॑शिरः। उ॒त वा॑मु॒षसो॑ बु॒धि सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॑:। सु॒तो मि॒त्राय॒ वरु॑णाय पी॒तये॒ चारु॑र्ऋ॒ताय॑ पी॒तये॑ ॥

इ॒मे । आ । या॒त॒म् । इन्द॑वः । सोमा॑सः । दधि॑ऽआशिरः । सु॒तासः॑ । दधि॑ऽआशिरः । उ॒त । वा॒म् । उ॒षसः॑ । बु॒धि । सा॒कम् । सूर्य॑स्य । र॒श्मिऽभिः॑ । सु॒तः । मि॒त्राय । वरु॑णाय । पी॒तये॑ । चारुः॑ । ऋ॒ताय॑ । पी॒तये॑ ॥

Mantra without Swara
इम आ यातमिन्दव: सोमासो दध्याशिरः सुतासो दध्याशिरः। उत वामुषसो बुधि साकं सूर्यस्य रश्मिभि:। सुतो मित्राय वरुणाय पीतये चारुर्ऋताय पीतये ॥

इमे। आ। यातम्। इन्दवः। सोमासः। दधिऽआशिरः। सुतासः। दधिऽआशिरः। उत। वाम्। उषसः। बुधि। साकम्। सूर्यस्य। रश्मिऽभिः। सुतः। मित्राय। वरुणाय। पीतये। चारुः। ऋताय। पीतये ॥ १.१३७.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 2

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Meaning
हे पढ़ाने वा पढ़नेवाले ! जो (चारुः) सुन्दर (मित्राय) मित्र के लिये (पीतये) पीने को और (वरुणाय) उत्तम जन के लिये (ऋताय) सत्याचरण और (पीतये) पीने को (उषसः) प्रभात वेला के (बुधि) प्रबोध में (सूर्य्यस्य) सूर्यमण्डल की (रश्मिभिः) किरणों के (साकम्) साथ ओषधियों का रस (सुतः) सब ओर से सिद्ध किया गया है उसको तुम (आयातम्) प्राप्त होओ तथा (वाम्) तुम्हारे लिये (इमे) ये (इन्दवः) गीले वा टपकते हुए (सोमासः) दिव्य ओषधियों के रस और (दध्याशिरः) जो पदार्थ दही के साथ भोजन किये जाते उनके समान (दध्याशिरः) दही से मिले हुए भोजन (सुतासः) सिद्ध किये गये हैं (उत) उन्हें भी प्राप्त होओ ॥ २ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में जितने रस वा ओषधियों को सिद्ध करें, उन सबको मित्रपन और उत्तम कर्म सेवने को तथा आलस्यादि दोषों के नाश करने को समर्पण करें ॥ २ ॥
Subject
अब ओषधि आदि पदार्थों के रस के पीने आदि के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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