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Rigveda Mandal 1 / Sukta 137 / Mantra 1

191 Sukta
3 Mantra
1/137/1
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- निचृदतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒षु॒मा या॑त॒मद्रि॑भि॒र्गोश्री॑ता मत्स॒रा इ॒मे सोमा॑सो मत्स॒रा इ॒मे। आ रा॑जाना दिविस्पृशास्म॒त्रा ग॑न्त॒मुप॑ नः। इ॒मे वां॑ मित्रावरुणा॒ गवा॑शिर॒: सोमा॑: शु॒क्रा गवा॑शिरः ॥

सु॒षु॒म । आ । या॒त॒म् । अद्रि॑ऽभिः । गोऽश्री॑ताः । म॒त्स॒राः । इ॒मे । सोमा॑सः । मत्स॒राः । इ॒मे । आ । रा॒जा॒ना॒ । दि॒वि॒ऽस्पृ॒शा॒ । अ॒स्म॒ऽत्रा । ग॒न्त॒म् । उप॑ । नः॒ । इ॒मे । वा॒म् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । गोऽआ॑शिरः । सोमाः॑ । शु॒क्राः । गोऽआ॑शिरः ॥

Mantra without Swara
सुषुमा यातमद्रिभिर्गोश्रीता मत्सरा इमे सोमासो मत्सरा इमे। आ राजाना दिविस्पृशास्मत्रा गन्तमुप नः। इमे वां मित्रावरुणा गवाशिर: सोमा: शुक्रा गवाशिरः ॥

सुषुम। आ। यातम्। अद्रिऽभिः। गोऽश्रीताः। मत्सराः। इमे। सोमासः। मत्सराः। इमे। आ। राजाना। दिविऽस्पृशा। अस्मऽत्रा। गन्तम्। उप। नः। इमे। वाम्। मित्रावरुणा। गोऽआशिरः। सोमाः। शुक्राः। गोऽआशिरः ॥ १.१३७.१

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान वर्त्तमान (दिविस्पृशा) शुद्ध व्यवहार में स्पर्श करनेवाले (राजाना) प्रकाशमान सभासेनाधीशो ! जो (इमे) ये (अद्रिभिः) मेघों से (गोश्रीताः) किरणों को प्राप्त (मत्सराः) आनन्दप्रापक हम लोग (सुषुम) किसी व्यवहार को सिद्ध करें उसको (वाम्) तुम दोनों (आयातम्) आओ अच्छे प्रकार प्राप्त होओ, जो (इमे) ये (मत्सराः) आनन्द पहुँचानेहारी (सोमासः) सोमवल्ली आदि ओषधि हैं उनको (अस्मत्रा) हम लोगों में अच्छी प्रकार पहुँचाओ, जो (इमे) ये (गवाशिरः) गौएँ वा इन्द्रियों से व्याप्त होते उनके समान (शुक्राः) शुद्ध (सोमाः) ऐश्वर्ययुक्त पदार्थ और (गवाशिरः) गौएँ वा किरणों से व्याप्त होते उनको और (नः) हम लोगों के (उपागन्तम्) समीप पहुँचो ॥ १ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस जगत् में जैसे पृथिवी आदि पदार्थ जीवन के हेतु हैं, वैसे मेघ अतीव जीवन देनेवाले हैं, जैसे ये सब वर्त्त रहे हैं। वैसे मनुष्य वर्त्ते ॥ १ ॥
Subject
अब दूसरे अष्टक में द्वितीय अध्याय का आरम्भ और तीन ऋचावाले एक सौ सैंतीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य इस संसार में किसके समान वर्त्ते, इस विषय को कहा है ।