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Rigveda Mandal 1 / Sukta 136 / Mantra 7

191 Sukta
7 Mantra
1/136/7
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऊ॒ती दे॒वानां॑ व॒यमिन्द्र॑वन्तो मंसी॒महि॒ स्वय॑शसो म॒रुद्भि॑:। अ॒ग्निर्मि॒त्रो वरु॑ण॒: शर्म॑ यंस॒न्तद॑श्याम म॒घवा॑नो व॒यं च॑ ॥

ऊ॒ती । दे॒वाना॑म् । व॒यम् । इन्द्र॑ऽवन्तः । मं॒सी॒महि॑ । स्वऽय॑शसः । म॒रुत्ऽभिः॑ । अ॒ग्निः । मि॒त्रः । वरु॑णः । शर्म॑ । यंस॑न् । तत् । अ॒श्या॒म॒ । म॒घऽवा॑नः । व॒यम् । च॒ ॥

Mantra without Swara
ऊती देवानां वयमिन्द्रवन्तो मंसीमहि स्वयशसो मरुद्भि:। अग्निर्मित्रो वरुण: शर्म यंसन्तदश्याम मघवानो वयं च ॥

ऊती। देवानाम्। वयम्। इन्द्रऽवन्तः। मंसीमहि। स्वऽयशसः। मरुत्ऽभिः। अग्निः। मित्रः। वरुणः। शर्म। यंसन्। तत्। अश्याम। मघऽवानः। वयम्। च ॥ १.१३६.७

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 7

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Meaning
जैसे (मरुद्भिः) प्राणों के समान श्रेष्ठ जनों के साथ (अग्निः) बिजुली आदि रूपवाला अग्नि (मित्रः) सूर्य (वरुणः) चन्द्रमा (शर्म) सुख को (यंसन्) देते हैं वैसे (तत्) उस सुख को (इन्द्रवन्तः) बहुत ऐश्वर्ययुक्त (स्वयशसः) जिनके अपना यश विद्यमान वे (वयम्) हम लोग (देवानाम्) सत्य की कामना करनेवाले विद्वानों की (ऊती) रक्षा आदि क्रिया से (मंसीमहि) जानें (च) और इससे (वयम्) हम लोग (मघवानः) परम ऐश्वर्ययुक्त हुए कल्याण को (अश्याम) भोगें ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस संसार में पृथिवी आदि पदार्थ सुख और ऐश्वर्य करनेवाले हैं, वैसे ही विद्वानों की सिखावट और उनके सङ्ग हैं, इनसे हम लोग सुख और ऐश्वर्यवाले होकर निरन्तर आनन्दयुक्त हों ॥ ७ ॥ इस सूक्त में वायु और इन्द्र आदि पदार्थों के दृष्टान्तों से मनुष्यों के लिये विद्या और उत्तम शिक्षा का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये ॥इस अध्याय में क्रोध आदि का निवारण, अन्न आदि की रक्षा और परम ऐश्वर्य की प्राप्ति पर्यन्त अर्थ कहे हैं, इससे इस अध्याय में कहे हुए अर्थों की पिछले अध्याय में कहे हुए अर्थों के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह ऋग्वेद में दूसरे अष्टक में पहला अध्याय और छब्बीसवाँ वर्ग तथा प्रथम मण्डल में एकसौ छत्तीसवाँ सूक्त पूरा हुआ ॥
Subject
फिर विद्वान् जन इस संसार में किसके समान वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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