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Rigveda Mandal 1 / Sukta 136 / Mantra 4

191 Sukta
7 Mantra
1/136/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ॒यं मि॒त्राय॒ वरु॑णाय॒ शंत॑म॒: सोमो॑ भूत्वव॒पाने॒ष्वाभ॑गो दे॒वो दे॒वेष्वाभ॑गः। तं दे॒वासो॑ जुषेरत॒ विश्वे॑ अ॒द्य स॒जोष॑सः। तथा॑ राजाना करथो॒ यदीम॑ह॒ ऋता॑वाना॒ यदीम॑हे ॥

अ॒यम् । मि॒त्राय॑ । वरु॑णाय॑ । शम्ऽत॑मः । सोमः॑ । भू॒तु॒ । अ॒व॒ऽपाने॑षु । आऽभ॑गः । दे॒वः । दे॒वेषु॑ । आऽभ॑गः । तम् । दे॒वासः॑ । जु॒षे॒र॒त॒ । विश्वे॑ । अ॒द्य । स॒ऽजोष॑सः । तथा॑ । रा॒जा॒ना॒ । क॒र॒थः॒ । यत् । ईम॑हे । ऋत॑ऽवाना । यत् । ईम॑हे ॥

Mantra without Swara
अयं मित्राय वरुणाय शंतम: सोमो भूत्ववपानेष्वाभगो देवो देवेष्वाभगः। तं देवासो जुषेरत विश्वे अद्य सजोषसः। तथा राजाना करथो यदीमह ऋतावाना यदीमहे ॥

अयम्। मित्राय। वरुणाय। शम्ऽतमः। सोमः। भूतु। अवऽपानेषु। आऽभगः। देवः। देवेषु। आऽभगः। तम्। देवासः। जुषेरत। विश्वे। अद्य। सऽजोषसः। तथा। राजाना। करथः। यत्। ईमहे। ऋतऽवाना। यत्। ईमहे ॥ १.१३६.४

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (अयम्) यह (अवपानेषु) अत्यन्त रक्षा आदि व्यवहारों में (मित्राय) सबके मित्र और (वरुणाय) सबसे उत्तम के लिये (आभगः) समस्त ऐश्वर्य (शन्तमः) अतीव सुख (सोमः) और सुखयुक्त ऐश्वर्य्य करनेवाला न्याय (भूतु) हो वैसे जो (देवः) सुख अच्छे प्रकार देनेवाला (देवेषु) दिव्य विद्वानों और दिव्य गुणों में (आभगः) समस्त सौभाग्य हो (तम्) उसको (अद्य) आज (सजोषसः) समान धर्म का सेवन करनेवाले (विश्वे) समस्त (देवासः) विद्वान् जन (जुषेरत) सेवन करें वा उससे प्रीति करें और जैसे (यत्) जिस व्यवहार को (राजाना) प्रकाशमान सभा सेनापति (करथः) करें (तथा) वैसे उस व्यवहार को हम लोग (ईमहे) माँगते और जैसे (ऋतावाना) सत्य का सम्बन्ध करनेवाले (यत्) जिस काम को करें, वैसे उसको हम लोग भी (ईमहे) याचें माँगें ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। इस संसार में जैसे शास्त्रवेत्ता विद्वान् धर्म के अनुकूल व्यवहार से ऐश्वर्य्य की उन्नति कर सबके उपकार करनेहारे काम में खर्च करते वा जैसे सत्य व्यवहार को जानने की इच्छा करनेवाले धार्मिक विद्वानों को याचते अर्थात् उनसे अपने प्रिय पदार्थ को माँगते, वैसे सब मनुष्य अपने ऐश्वर्य को अच्छे काम में खर्च करें और विद्वान् महाशयों से विद्याओं की याचना करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर इस संसार में मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।