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Rigveda Mandal 1 / Sukta 135 / Mantra 9

191 Sukta
9 Mantra
1/135/9
Devata- वायु: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒मे ये ते॒ सु वा॑यो बा॒ह्वो॑जसो॒ऽन्तर्न॒दी ते॑ प॒तय॑न्त्यु॒क्षणो॒ महि॒ व्राध॑न्त उ॒क्षण॑:। धन्व॑ञ्चि॒द्ये अ॑ना॒शवो॑ जी॒राश्चि॒दगि॑रौकसः। सूर्य॑स्येव र॒श्मयो॑ दुर्नि॒यन्त॑वो॒ हस्त॑योर्दुर्नि॒यन्त॑वः ॥

इ॒मे । ये । ते॒ । सु । वा॒यो॒ इति॑ । बा॒हुऽओ॑जसः । अ॒न्तः । न॒दी इति॑ । ते॒ । प॒तय॑न्ति । उ॒क्षणः॑ । महि॑ । व्राध॑न्तः । उ॒क्षणः॑ । धन्व॑न् । चि॒त् । ये । अ॒ना॒शवः॑ । जी॒राः । चि॒त् । अगि॑राऽओकसः । सूर्य॑स्यऽइव । र॒श्मयः॑ । दुः॒ऽनि॒यन्त॑वः । हस्त॑योः । दुः॒ऽनि॒यन्त॑वः ॥

Mantra without Swara
इमे ये ते सु वायो बाह्वोजसोऽन्तर्नदी ते पतयन्त्युक्षणो महि व्राधन्त उक्षण:। धन्वञ्चिद्ये अनाशवो जीराश्चिदगिरौकसः। सूर्यस्येव रश्मयो दुर्नियन्तवो हस्तयोर्दुर्नियन्तवः ॥

इमे। ये। ते। सु। वायो इति। बाहुऽओजसः। अन्तः। नदी इति। ते। पतयन्ति। उक्षणः। महि। व्राधन्तः। उक्षणः। धन्वन्। चित्। ये। अनाशवः। जीराः। चित्। अगिराऽओकसः। सूर्यस्यऽइव। रश्मयः। दुःऽनियन्तवः। हस्तयोः। दुःऽनियन्तवः ॥ १.१३५.९

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 4

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Meaning
हे (वायो) विद्वन् ! (ये) जो (इमे) ये योद्धा लोग (ते) आपके सहाय से (बाह्वोजसः) भुजाओं के बल के (अन्तः) बीच (सु, पतयन्ति) पालनेवाले के समान आचरण करते, उनको (उक्षणः) सींचने में समर्थ कीजिये, (ये) जो (ते) आपके उपदेश से (मही) बहुत (व्राधन्तः) बढ़ते हुए अच्छे प्रकार पालनेवाले समान आचरण करते हैं उनको (उक्षणः) बल देनेवाले कीजिये, जो (धन्वन्) अन्तरिक्ष में (नदी) नदी के (चित्) समान वर्त्तमान (अनाशवः) किसी में व्याप्त नहीं (जीराः) वेगवान् (अगिरौकसः) जिनका अविद्यमान वाणी के साथ ठहरने का स्थान (दुर्नियन्तवः) जो दुःख से ग्रहण करने के योग्य वे (रश्मयः) किरण जैसे (सूर्यस्येव) सूर्य को वैसे (चित्) और (हस्तयोः) अपनी भुजाओं के प्रताप से शत्रुओं ने (दुर्नियन्तवः) दुःख से ग्रहण करने योग्य अच्छी पालना करनेवाले के समान आचरण करें, उन वीरों का निरन्तर सत्कार करो ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। राजपुरुषों को चाहिये कि बाहुबलयुक्त शत्रुओं से न डरनेवाले वीर पुरुषों को सेना में सदैव रक्खें, जिससे राज्य का प्रताप सदा बढ़े ॥ ९ ॥इस सूक्त में मनुष्यों का परस्पर वर्त्ताव कहने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये ॥यह १३५ एकसौ पैंतीसवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर राजा को युद्ध के लिये कौन पठाने योग्य हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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