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Rigveda Mandal 1 / Sukta 135 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/135/5
Devata- वायु: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ वां॒ धियो॑ ववृत्युरध्व॒राँ उपे॒ममिन्दुं॑ मर्मृजन्त वा॒जिन॑मा॒शुमत्यं॒ न वा॒जिन॑म्। तेषां॑ पिबतमस्म॒यू आ नो॑ गन्तमि॒होत्या। इन्द्र॑वायू सु॒ताना॒मद्रि॑भिर्यु॒वं मदा॑य वाजदा यु॒वम् ॥

आ । वा॒म् । धियः॑ । व॒वृ॒त्युः॒ । अ॒ध्व॒रान् । उप॑ । इ॒मम् । इन्दु॑म् । म॒र्मृ॒ज॒न्त॒ । वा॒जिन॑म् । आ॒शुम् । अत्य॑म् । न । वा॒जिन॑म् । तेषा॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒स्म॒यू इत्य॑स्म॒ऽयू । आ । नः॒ । ग॒न्त॒म् । इ॒ह । ऊ॒त्या । इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । सु॒ताना॑म् । अद्रि॑ऽभिः । यु॒वम् । मदा॑य । वा॒ज॒ऽदा॒ । यु॒वम् ॥

Mantra without Swara
आ वां धियो ववृत्युरध्वराँ उपेममिन्दुं मर्मृजन्त वाजिनमाशुमत्यं न वाजिनम्। तेषां पिबतमस्मयू आ नो गन्तमिहोत्या। इन्द्रवायू सुतानामद्रिभिर्युवं मदाय वाजदा युवम् ॥

आ। वाम्। धियः। ववृत्युः। अध्वरान्। उप। इमम्। इन्दुम्। मर्मृजन्त। वाजिनम्। आशुम्। अत्यम्। न। वाजिनम्। तेषाम्। पिबतम्। अस्मयू इत्यस्मऽयू। आ। नः। गन्तम्। इह। ऊत्या। इन्द्रवायू इति। सुतानाम्। अद्रिऽभिः। युवम्। मदाय। वाजऽदा। युवम् ॥ १.१३५.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्रवायू) सूर्य्य और पवन के समान सभा सेनाधीशो ! जो उपदेश करने वा पढ़ानेवाले विद्वान् जन (वाम्) तुम्हारे (धियः) बुद्धि और कर्मों वा (अध्वरान्) हिंसा न करनेवाले जनों (इमम्) इस (इन्दुम्) परम ऐश्वर्य्य और (वाजिनम्) प्रशंसित वेगयुक्त (आशुम्) काम में शीघ्रता करनेवाले (वाजिनम्) अनेक शुभ लक्षणों से युक्त (अत्यम्) निरन्तर गमन करते हुए घोड़े के (न) समान (आ, ववृत्युः) अच्छे प्रकार वर्त्तें, कार्य्य में लावें और इस परम ऐश्वर्य्य को (उप, मर्मृजन्त) समीप में अत्यन्त शुद्ध करें (तेषाम्) उनके (अद्रिभिः) अच्छे प्रकार पर्वत के टूंक वा उखली मूशलों से (सुतानाम्) सिद्ध किये अर्थात् कूट-पीट बनाए हुए पदार्थों के रस को (मदाय) आनन्द के लिये (युवम्) तुम (पिबतम्) पीओ तथा (अस्मयू) हम लोगों के समान आचरण करते हुए (वाजदा) विशेष ज्ञान देनेवाले (युवम्) तुम दोनों इस संसार में (ऊत्या) रक्षा आदि उत्तम क्रिया से (नः) हम लोगों को (आगन्तम्) प्राप्त होओ ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार हैं। जो उपदेश करने और पढ़ानेवाले मनुष्यों की बुद्धियों को शुद्ध कर अच्छे सिखाये हुए घोड़े के समान पराक्रम युक्त कराते, वे आनन्द सेवनवाले होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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