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Rigveda Mandal 1 / Sukta 135 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/135/4
Devata- वायु: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ वां॒ रथो॑ नि॒युत्वा॑न्वक्ष॒दव॑से॒ऽभि प्रयां॑सि॒ सुधि॑तानि वी॒तये॒ वायो॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। पिब॑तं॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः पूर्व॒पेयं॒ हि वां॑ हि॒तम्। वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ राध॒सा ग॑त॒मिन्द्र॑श्च॒ राध॒सा ग॑तम् ॥

आ । वा॒म् । रथः॑ । नि॒युत्वा॑न् । व॒क्ष॒त् । अव॑से । अ॒भि । प्रयां॑सि । सुऽधि॑तानि । वी॒तये॑ । वायो॒ इति॑ । ह॒व्यानि॑ । वी॒तये॑ । पिब॑तम् । मध्वः॑ । अन्ध॑सः । पू॒र्व॒ऽपेय॑म् । हि । वा॒म् । हि॒तम् । वायो॒ इति॑ । आ । च॒न्द्रेण॑ । राध॑सा । आ । ग॒त॒म् । इन्द्रः॑ । च॒ । राध॑सा । आ । ग॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
आ वां रथो नियुत्वान्वक्षदवसेऽभि प्रयांसि सुधितानि वीतये वायो हव्यानि वीतये। पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम्। वायवा चन्द्रेण राधसा गतमिन्द्रश्च राधसा गतम् ॥

आ। वाम्। रथः। नियुत्वान्। वक्षत्। अवसे। अभि। प्रयांसि। सुऽधितानि। वीतये। वायो इति। हव्यानि। वीतये। पिबतम्। मध्वः। अन्धसः। पूर्वऽपेयम्। हि। वाम्। हितम्। वायो इति। आ। चन्द्रेण। राधसा। आ। गतम्। इन्द्रः। च। राधसा। आ। गतम् ॥ १.१३५.४

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 4

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Meaning
हे सभासेनाधीशो ! जो (वाम्) तुम्हारा (नियुत्वान्) पवन के समान वेगवान् (रथः) रथ (पीतये) आनन्द की प्राप्ति के लिये (सुधितानि) अच्छे प्रकार धारण किये हुए (प्रयांसि) प्रीति के अनुकूल पदार्थों को (अभ्यावक्षत्) चारों ओर से अच्छे प्रकार पहुँचे और (अवसे) विजय की प्राप्ति वा (वीतये) धर्म की प्रवृत्ति के लिए (हव्यानि) देने योग्य पदार्थों को चारों ओर भली-भाँति पहुँचावे, वे तुम जैसे (इन्द्रः) बिजुली रूप आग (च) और पवन आवें वैसे (राधसा) जिससे सिद्धि को प्राप्त होते उस पदार्थ के साथ (आ, गतम्) आओ, जो (मध्वः) मीठे (अन्धसः) अन्न का (पूर्वपेयम्) अगले मनुष्यों के पीने योग्य (वाम्) और तुम दोनों के लिये (हितम्) सुखरूप भाग है उसको (पिबतम्) पिओ और (चन्द्रेण) सुवर्णरूप (राधसा) उत्तम सिद्धि करनेवाले धन के साथ (आगतम्) आओ। हे (वायो) पवन के समान प्रिय ! आप उत्तम सिद्धि करनेवाले सुवर्ण के साथ सुखभोग को (आ) प्राप्त होओ और हे (वायो) दुष्टों की हिंसा करनेवाले ! लेने-देने योग्य पदार्थों को भी (आ) प्राप्त होओ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे पवन और बिजुली सब में अभिव्याप्त होकर सब वस्तुओं का सेवन करते, वैसे सज्जनों को चाहिये कि ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये सब साधनों का सेवन करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर मनुष्यों को किसके समान होना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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