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Rigveda Mandal 1 / Sukta 135 / Mantra 3

191 Sukta
9 Mantra
1/135/3
Devata- वायु: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- निचृदत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ नो॑ नि॒युद्भि॑: श॒तिनी॑भिरध्व॒रं स॑ह॒स्रिणी॑भि॒रुप॑ याहि वी॒तये॒ वायो॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। तवा॒यं भा॒ग ऋ॒त्विय॒: सर॑श्मि॒: सूर्ये॒ सचा॑। अ॒ध्व॒र्युभि॒र्भर॑माणा अयंसत॒ वायो॑ शु॒क्रा अ॑यंसत ॥

आ । नः॒ । नि॒युत्ऽभिः॑ । श॒तिनी॑भिः । अ॒ध्व॒रम् । स॒ह॒स्रिणी॑भिः । उप॑ । या॒हि॒ । वी॒तये॑ । वायो॒ इति॑ । ह॒व्यानि॑ । वी॒तये॑ । तव॑ । अ॒यम् । भा॒गः । ऋ॒त्वियः॑ । सऽर॑श्मिः । सूर्ये॑ । सचा॑ । अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑ । भर॑माणाः । अ॒यं॒स॒त॒ । वायो॒ इति॑ । शु॒क्राः । अ॒यं॒स॒त॒ ॥

Mantra without Swara
आ नो नियुद्भि: शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरुप याहि वीतये वायो हव्यानि वीतये। तवायं भाग ऋत्विय: सरश्मि: सूर्ये सचा। अध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत ॥

आ। नः। नियुत्ऽभिः। शतिनीभिः। अध्वरम्। सहस्रिणीभिः। उप। याहि। वीतये। वायो इति। हव्यानि। वीतये। तव। अयम्। भागः। ऋत्वियः। सऽरश्मिः। सूर्ये। सचा। अध्वर्युऽभिः। भरमाणाः। अयंसत। वायो इति। शुक्राः। अयंसत ॥ १.१३५.३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वायो) विद्वान् ! (तव) आपके जो (अध्वर्य्युभिः) अपने को यज्ञ की इच्छा करनेवालों ने (भरमाणाः) धारण किये मनुष्य (अयंसत) निवृत्त होवें सुख जैसे हो वैसे (अयंसत) निवृत्त हों अर्थात् सांसारिक सुख को छोड़े, जिन आपका (सूर्ये) सूर्य के बीच (सचा) अच्छे प्रकार संयोग किये हुई (शुक्राः) शुद्ध किरणों के समान (सरश्मिः) प्रकाशों के साथ वर्त्तमान (ऋत्वियः) जिसका ऋतु समय प्राप्त हुआ वह (अयम्) यह (भागः) भाग है सो आप (वीतये) व्याप्त होने के लिये (हव्यानि) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को (उपयाहि) समीप पहुँचे प्राप्त हों। हे (वायो) प्रशंसित बलयुक्त जो (शतिनीभिः) प्रशंसित सैकड़ों अङ्गों से युक्त सेनाओं के साथ वा (सहस्रिणीभिः) जिनमें बहुत हजार शूरवीरों के समूह उन सेनाओं के साथ वा (नियुद्भिः) पवन के गुण के समान घोड़ों से (वीतये) कामना के लिये (नः) हम लोगों के (अध्वरम्) राज्यपालनरूप यज्ञ को प्राप्त होते, उनको आप (आ) आकर प्राप्त होओ ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि शत्रुओं के बल से चौगुना वा अधिक बल कर दुष्ट शत्रुओं के साथ युद्ध करें और वे प्रतिवर्ष प्रजाजनों से जितना कर लेना योग्य हो उतना ही लेवें तथा सदैव धर्मात्मा विद्वानों की सेवा करें ॥ ३ ॥
Subject
फिर राजा को प्रजाजनों से क्या लेना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।