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Rigveda Mandal 1 / Sukta 134 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/134/5
Devata- वायु: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- अष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
तुभ्यं॑ शु॒क्रास॒: शुच॑यस्तुर॒ण्यवो॒ मदे॑षू॒ग्रा इ॑षणन्त भु॒र्वण्य॒पामि॑षन्त भु॒र्वणि॑। त्वां त्सा॒री दस॑मानो॒ भग॑मीट्टे तक्व॒वीये॑। त्वं विश्व॑स्मा॒द्भुव॑नात्पासि॒ धर्म॑णासु॒र्या॑त्पासि॒ धर्म॑णा ॥

तु॒भ्य॑म् । शु॒क्रास॑ । शुच॑यः । तु॒र॒ण्यवः॑ । मदे॑षु । उ॒ग्राः । इ॒ष॒ण॒न्त॒ । भु॒र्वणि॑ । अ॒पाम् । इ॒ष॒न्त॒ । भु॒र्वणि॑ । त्वाम् । त्सा॒री । दस॑मानः । भग॑म् । ई॒ट्टे॒ । त॒क्व॒ऽवीये॑ । त्वम् । विश्व॑स्मात् । भुव॑नात् । पा॒सि॒ । धर्म॑णा । अ॒सु॒र्या॑त् । पा॒सि॒ । धर्म॑णा ॥

Mantra without Swara
तुभ्यं शुक्रास: शुचयस्तुरण्यवो मदेषूग्रा इषणन्त भुर्वण्यपामिषन्त भुर्वणि। त्वां त्सारी दसमानो भगमीट्टे तक्ववीये। त्वं विश्वस्माद्भुवनात्पासि धर्मणासुर्यात्पासि धर्मणा ॥

तुभ्यम्। शुक्रास। शुचयः। तुरण्यवः। मदेषु। उग्राः। इषणन्त। भुर्वणि। अपाम्। इषन्त। भुर्वणि। त्वाम्। त्सारी। दसमानः। भगम्। ईट्टे। तक्वऽवीये। त्वम्। विश्वस्मात्। भुवनात्। पासि। धर्मणा। असुर्यात्। पासि। धर्मणा ॥ १.१३४.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 23 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! जो (त्वम्) आप (धर्मणा) धर्म से (असुर्यात्) दुष्टों के निज व्यवहार से (पासि) रक्षा करते हो वा (धर्मणा) धर्म के साथ (विश्वस्मात्) समग्र (भुवनात्) संसार से (पासि) रक्षा करते हो तथा (त्सारी) तिरछे-बाँके चलते और (दसमानः) शत्रुओं का संहार करते हुए आप (तक्ववीये) जिसमें चोरों का सम्बन्ध नहीं उस मार्ग में (भगम्) ऐश्वर्य्य की (ईट्टे) प्रशंसा करते उन (त्वाम्) आपको जो (अपाम्) जल वा कर्मों की (भुर्वणि) धारणावाले व्यवहार में (इषन्त) चाहते हैं, वे (तुरण्यवः) पालना और (शुचयः) पवित्रता करनेवाले (शुक्रासः) शुद्ध वीर्य (उग्राः) तीव्र जन (मदेषु) आनन्दों में (भुर्वणि) और पालन-पोषण करनेवाले व्यवहार में (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (इषणन्त) इच्छा करें ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्यों की योग्यता है कि जो जिनकी रक्षा करें, उनकी वे भी रक्षा करें। दुष्टों की निवृत्ति से ऐश्वर्य्य को चाहें और कभी दुष्टों में विश्वास न करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर मनुष्य कैसे अपना वर्त्ताव वर्त्ते, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।