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Rigveda Mandal 1 / Sukta 134 / Mantra 4

191 Sukta
6 Mantra
1/134/4
Devata- वायु: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तुभ्य॑मु॒षास॒: शुच॑यः परा॒वति॑ भ॒द्रा वस्त्रा॑ तन्वते॒ दंसु॑ र॒श्मिषु॑ चि॒त्रा नव्ये॑षु र॒श्मिषु॑। तुभ्यं॑ धे॒नुः स॑ब॒र्दुघा॒ विश्वा॒ वसू॑नि दोहते। अज॑नयो म॒रुतो॑ व॒क्षणा॑भ्यो दि॒व आ व॒क्षणा॑भ्यः ॥

तुभ्य॑म् । उ॒षसः॑ । शुच॑यः । प॒रा॒वति॑ । भ॒द्रा । वस्त्रा॑ । त॒न्व॒ते॒ । दम्ऽसु॑ । र॒श्मिषु॑ । चि॒त्रा । नव्ये॑षु । र॒श्मिषु॑ । तुभ्य॑म् । धे॒नुः । स॒बः॒ऽदुघा॑ । विश्वा॑ । वसू॑नि । दो॒ह॒ते॒ । अज॑नयः । म॒रुतः॑ । व॒क्षणा॑भ्यः । दि॒वः । आ । व॒क्षणा॑भ्यः ॥

Mantra without Swara
तुभ्यमुषास: शुचयः परावति भद्रा वस्त्रा तन्वते दंसु रश्मिषु चित्रा नव्येषु रश्मिषु। तुभ्यं धेनुः सबर्दुघा विश्वा वसूनि दोहते। अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आ वक्षणाभ्यः ॥

तुभ्यम्। उषसः। शुचयः। परावति। भद्रा। वस्त्रा। तन्वते। दम्ऽसु। रश्मिषु। चित्रा। नव्येषु। रश्मिषु। तुभ्यम्। धेनुः। सबःऽदुघा। विश्वा। वसूनि। दोहते। अजनयः। मरुतः। वक्षणाभ्यः। दिवः। आ। वक्षणाभ्यः ॥ १.१३४.४

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! जैसे (शुचयः) शुद्ध (उषासः) प्रातः समय के पवन (परावति) दूर देश में (दंसु) जिनमें मनुष्य मन का दमन करते उन (रश्मिषु) किरणों में और (नव्येषु) नवीन (रश्मिषु) किरणों में वैसे (तुभ्यम्) तेरे लिये (चित्रा) चित्र-विचित्र अद्भुत (भद्रा) सुख करनेवाले (वस्त्रा) वस्त्र वा ढाँपने के अन्य पदार्थों का (तन्वते) विस्तार करते वा जैसे (सबर्दुघा) सब कामों को पूर्ण करती हुई (धेनुः) वाणी (तुभ्यम्) तेरे लिये (विश्वा) समस्त (वसूनि) धनों को (दोहते) पूरा करती वा जैसे (अजनयः) न उत्पन्न होनेवाले (मरुतः) पवन (वक्षणाभ्यः) जो जलादि पदार्थों को बहानेवाली नदियों में (दिवः) प्रकाश के बीच (वक्षणाभ्यः) बहानेवाली किरणों से जल का (आ) अच्छे प्रकार विस्तार करते, वैसा तू हो ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य किरणों के समान न्याय के प्रकाश और अच्छी शिक्षा युक्त वाणी के समान वक्तृता बोल-चाल और नदी के समान अच्छे गुणों की प्राप्ति करते, वे समग्र सुख को प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर कौन मनुष्य कल्याण करनेवाले होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।