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Rigveda Mandal 1 / Sukta 134 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/134/3
Devata- वायु: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- निचृदत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वा॒युर्यु॑ङ्क्ते॒ रोहि॑ता वा॒युर॑रु॒णा वा॒यू रथे॑ अजि॒रा धु॒रि वोळ्ह॑वे॒ वहि॑ष्ठा धु॒रि वोळ्ह॑वे। प्र बो॑धया॒ पुरं॑धिं जा॒र आ स॑स॒तीमि॑व। प्र च॑क्षय॒ रोद॑सी वासयो॒षस॒: श्रव॑से वासयो॒षस॑: ॥

वा॒युः । यु॒ङ्क्ते॒ । रोहि॑ता । वा॒युः । अ॒रु॒णा । वा॒युः । रथे॑ । अ॒जि॒रा । धु॒रि । वोळ्ह॑वे । वहि॑ष्ठा । धु॒रि । वोळ्ह॑वे । प्र । बो॒ध॒य॒ । पुर॑म्ऽधिम् । जा॒रः । आ । स॒स॒तीम्ऽइ॑व । प्र । च॒क्ष॒य॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । वा॒स॒य॒ । उ॒षसः॒ । श्रव॑से । वा॒स॒य॒ । उ॒षसः॑ ॥

Mantra without Swara
वायुर्युङ्क्ते रोहिता वायुररुणा वायू रथे अजिरा धुरि वोळ्हवे वहिष्ठा धुरि वोळ्हवे। प्र बोधया पुरंधिं जार आ ससतीमिव। प्र चक्षय रोदसी वासयोषस: श्रवसे वासयोषस: ॥

वायुः। युङ्क्ते। रोहिता। वायुः। अरुणा। वायुः। रथे। अजिरा। धुरि। वोळ्हवे। वहिष्ठा। धुरि। वोळ्हवे। प्र। बोधय। पुरम्ऽधिम्। जारः। आ। ससतीम्ऽइव। प्र। चक्षय। रोदसी इति। वासय। उषसः। श्रवसे। वासय। उषसः ॥ १.१३४.३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 23 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् (धुरि) सबके आधारभूत जगत् में (वोढवे) पदार्थों के पहुँचाने को (वहिष्ठा) अतीव पहुँचानेवाला (वायुः) पवन (वोढवे) देशान्तर में पहुँचाने के लिये (धुरि) चलाने के मुख्य भाग में (रोहिता) लाल-लाल रङ्ग के अग्नि आदि पदार्थों को वा (वायुः) पवन (अरुणा) पदार्थों को पहुँचाने में समर्थ जल, धूआँ आदि पदार्थों को (वायुः) पवन (अजिराः) फेंकने योग्य पदार्थों को (रथे) रथ में (युङ्क्ते) जोड़ता है अर्थात् कलाकौशल से प्रेरणा को प्राप्त हुआ उन पदार्थों का सम्बन्ध करता है इससे आप (जारः) जाल्म पुरुष जैसे (ससतीमिव) सोती हुई स्त्री को जगावे वैसे (पुरन्धिम्) बहुत उत्तम बुद्धिमती स्त्री को (प्राबोधय) भली भाँति बोध कराओ, (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी का (प्र, चक्षय) उत्तम व्याख्यान करो अर्थात् उनके गुणों को कहो, (उषसः) दाह आदि के करनेवाले पदार्थों अर्थात् अग्नि आदि को कलायन्त्रादिकों में (वासय) वसाओ स्थापन करो और (श्रवसे) सन्देशादि सुनने के लिये (उषसः) दिनों को (वासय) तार बिजुली की विद्या से स्थिर करो ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो पवन के समान अच्छा यत्न करते और उत्तम धर्मात्मा के समान मनुष्यों को बोध कराते हैं, वे सूर्य्य और पृथिवी के समान प्रकाश और सहनशीलता से युक्त होते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर विद्वानों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।