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Rigveda Mandal 1 / Sukta 133 / Mantra 7

191 Sukta
7 Mantra
1/133/7
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
व॒नोति॒ हि सु॒न्वन्क्षयं॒ परी॑णसः सुन्वा॒नो हि ष्मा॒ यज॒त्यव॒ द्विषो॑ दे॒वाना॒मव॒ द्विष॑:। सु॒न्वा॒न इत्सि॑षासति स॒हस्रा॑ वा॒ज्यवृ॑तः। सु॒न्वा॒नायेन्द्रो॑ ददात्या॒भुवं॑ र॒यिं द॑दात्या॒भुव॑म् ॥

व॒नोति॑ । हि । सु॒न्वन् । क्षय॑म् । परी॑णसः । सु॒न्वा॒नः । हि । स्म॒ । यज॑ति । अव॑ । द्विषः॑ । दे॒वाना॑म् । अव॑ । द्विषः॑ । सु॒न्वा॒नः । इत् । सि॒सा॒स॒ति॒ । स॒हस्रा॑ । वा॒जी । अवृ॑तः । सु॒न्वा॒नाय॑ । इन्द्रः॑ । द॒दा॒ति॒ । आ॒ऽभुव॑म् । र॒यिम् । द॒दा॒ति॒ । आ॒ऽभुव॑म् ॥

Mantra without Swara
वनोति हि सुन्वन्क्षयं परीणसः सुन्वानो हि ष्मा यजत्यव द्विषो देवानामव द्विष:। सुन्वान इत्सिषासति सहस्रा वाज्यवृतः। सुन्वानायेन्द्रो ददात्याभुवं रयिं ददात्याभुवम् ॥

वनोति। हि। सुन्वन्। क्षयम्। परीणसः। सुन्वानः। हि। स्म। यजति। अव। द्विषः। देवानाम्। अव। द्विषः। सुन्वानः। इत्। सिसासति। सहस्रा। वाजी। अवृतः। सुन्वानाय। इन्द्रः। ददाति। आऽभुवम्। रयिम्। ददाति। आऽभुवम् ॥ १.१३३.७

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 7

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (इन्द्रः) सुख देनेवाला (सुन्वानाय) पदार्थों का सार निकालते हुए पुरुष को (आभुवम्) जिसमें अच्छे प्रकार सुख होता उस (रयिम्) धन को (ददाति) देता है वह (सुन्वानः) पदार्थों के सारों को प्रकट हुआ (अवृतः) प्रकट (वाजी) प्रशस्त ज्ञानवान् पुरुष (सहस्रा) हजारों (देवानाम्) विद्वानों के (अव, द्विषः) अति शत्रुओं को (इत्) ही (सिषासति) अलग करने को चाहता है जो (अव, द्विषः) अत्यन्त वैर करनेवालों को अलग करना चाहता है वह सबके लिये (आभुवम्) जिसमें उत्तम सुख हो उस धन को (ददाति) देता है और जो (हि) निश्चय से (सुन्वानः) पदार्थों के सार को सिद्ध करता हुआ (यजति) सङ्ग करता है (स्म) वही (परीणसः) बहुत पदार्थों और (क्षयम्) घर को (सुन्वन्) सिद्ध करता हुआ (हि) ही सुख (वनोति) माँगता है ॥ ७ ॥
Essence
जो सब में मित्रता की भावना कराकर सबके शत्रुओं की निवृत्ति कराते हैं, वे सबके सुख करनेवाले होकर सबके लिये बहुत सुख दे सकते हैं ॥ ७ ॥इस सूक्त में श्रेष्ठों की पालना और दुष्टों की निवृत्ति से राज्य की स्थिरता का वर्णन है, इससे इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एक सौ तेंतीसवाँ सूक्त बाईसवाँ वर्ग और उन्नीसवाँ अनुवाक पूरा हुआ ॥
Subject
फिर क्या करके और किसकी निवृत्ति कर मनुष्य समर्थ होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।