Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 133 / Mantra 6

191 Sukta
7 Mantra
1/133/6
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराड्ब्राह्मीजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒वर्म॒ह इ॑न्द्र दादृ॒हि श्रु॒धी न॑: शु॒शोच॒ हि द्यौः क्षा न भी॒षाँ अ॑द्रिवो घृ॒णान्न भी॒षाँ अ॑द्रिवः। शु॒ष्मिन्त॑मो॒ हि शु॒ष्मिभि॑र्व॒धैरु॒ग्रेभि॒रीय॑से। अपू॑रुषघ्नो अप्रतीत शूर॒ सत्व॑भिस्त्रिस॒प्तैः शू॑र॒ सत्व॑भिः ॥

अ॒वः । म॒हः । इ॒न्द्र॒ । द॒दृ॒हि । श्रु॒धि । नः॒ । शु॒शोच॑ । हि । द्यौः । क्षाः । न । भी॒षा । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । घृ॒णात् । न । भी॒षा । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । शु॒ष्मिन्ऽत॑मः । हि । शु॒ष्मिऽभिः॑ । व॒धैः । उ॒ग्रेभिः॑ । ईय॑से । अपु॑रुषऽघ्नः । अ॒प्र॒ति॒ऽइ॒त॒ । शू॒र॒ । सत्व॑ऽभिः । त्रि॒ऽस॒प्तैः । शू॒र॒ । सत्व॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
अवर्मह इन्द्र दादृहि श्रुधी न: शुशोच हि द्यौः क्षा न भीषाँ अद्रिवो घृणान्न भीषाँ अद्रिवः। शुष्मिन्तमो हि शुष्मिभिर्वधैरुग्रेभिरीयसे। अपूरुषघ्नो अप्रतीत शूर सत्वभिस्त्रिसप्तैः शूर सत्वभिः ॥

अवः। महः। इन्द्र। ददृहि। श्रुधि। नः। शुशोच। हि। द्यौः। क्षाः। न। भीषा। अद्रिऽवः। घृणात्। न। भीषा। अद्रिऽवः। शुष्मिन्ऽतमः। हि। शुष्मिऽभिः। वधैः। उग्रेभिः। ईयसे। अपुरुषऽघ्नः। अप्रतिऽइत। शूर। सत्वऽभिः। त्रिऽसप्तैः। शूर। सत्वऽभिः ॥ १.१३३.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 6

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अद्रिवः) प्रशंसित मेघयुक्त सूर्य के समान वर्त्तमान (इन्द्र) उत्तम गुणों से प्रकाशित पुरुष ! आप (अवः) नीचे को मुख राखनेवाले कुटिल को (दादृहि) विदारो मारो (नः) हम लोगों को (शुशोच) शोचो, हमारे न्याय को (श्रुधि) सुनो और (द्यौः) प्रकाश जैसे (क्षाः) भूमियों को (न) वैसे (महः) अत्यन्त रक्षा करो, हे (अद्रिवः) प्रशंसित पर्वतोंवाले ! आप (हि) ही (भीषा) भय से (घृणात्) प्रकाशित के समान न्याय को प्रकाश करो और (भीषा) भय से दुष्टों को दण्ड देओ। हे (शूर) निर्भय निडर शूरवीर पुरुष ! (शुष्मिन्तमः) जिनके अतीव बहुत बल विद्यमान (अपूरुषघ्नः) जो पुरुषों को न मारनेवाले आप (उग्रेभिः) तीक्ष्ण स्वभाववाले (शुष्मिभिः) बली पुरुषों के साथ तीक्ष्ण शत्रुओं के (वधैः) मारने के उपायों से (ईयसे) जाते हो सो आप (त्रिसप्तैः) इक्कीस (सत्वभिः) विद्वानों के साथ ही वर्त्ताव रक्खो। हे (अप्रतीत) न प्रतीत होनेवाले गूढ़ विचारयुक्त (शूरः) दुष्टों को मारनेवाले आप (हि) ही (सत्वभिः) पदार्थों से युक्त होओ ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। धार्मिक पुरुषों को नीचपन की निवृत्ति और उत्तमता का प्रचार कर प्रशंसित बल की उन्नति के लिए शूरवीर पुरुषों से प्रजाजनों की अच्छे प्रकार रक्षा कर दश प्राण और एक जीव से दश इन्द्रियों के समान पुरुषार्थ कर यथायोग्य पदार्थों की वृद्धि प्राप्त करने योग्य है ॥ ६ ॥
Subject
फिर उत्तम मनुष्यों को किसकी निवृत्ति कर क्या प्रचार करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।