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Rigveda Mandal 1 / Sukta 133 / Mantra 5

191 Sukta
7 Mantra
1/133/5
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- आर्षीगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पि॒शङ्ग॑भृष्टिमम्भृ॒णं पि॒शाचि॑मिन्द्र॒ सं मृ॑ण। सर्वं॒ रक्षो॒ नि ब॑र्हय ॥

पि॒शङ्ग॑ऽभृष्टिम् । अ॒म्भृ॒णम् । पि॒शाचि॑म् । इ॒न्द्र॒ । सम् । मृ॒ण॒ । सर्व॑म् । रक्षः॑ । नि । ब॒र्ह॒य॒ ॥

Mantra without Swara
पिशङ्गभृष्टिमम्भृणं पिशाचिमिन्द्र सं मृण। सर्वं रक्षो नि बर्हय ॥

पिशङ्गऽभृष्टिम्। अम्भृणम्। पिशाचिम्। इन्द्र। सम्। मृण। सर्वम्। रक्षः। नि। बर्हय ॥ १.१३३.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्रः) दुष्टों को विदीर्ण करनेहारे राजजन ! आप (पिशङ्गभृष्टिम्) अच्छे प्रकार पीला वर्ण होने से जिसका पाक होता (अम्भृणम्) उस निरन्तर भयङ्कर (पिशाचिम्) पीसने दुःख देनेहारे जन को (सम्मृण) अच्छे प्रकार मारो और (सर्वम्) समस्त (रक्षः) दुष्टजन को (निबर्हय) निकालो ॥ ५ ॥
Essence
राजपुरुषों को चाहिये कि दुष्ट शत्रुओं को निर्मूल कर सब सज्जनों को निरन्तर बढ़ावें ॥ ५ ॥
Subject
फिर राजजनों को क्या करके क्या बढ़ाना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।