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Rigveda Mandal 1 / Sukta 133 / Mantra 2

191 Sukta
7 Mantra
1/133/2
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒भि॒व्लग्या॑ चिदद्रिवः शी॒र्षा या॑तु॒मती॑नाम्। छि॒न्धि व॑टू॒रिणा॑ प॒दा म॒हाव॑टूरिणा प॒दा ॥

अ॒भि॒ऽव्लग्य॑ । चि॒त् । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । शी॒र्षा । या॒तु॒ऽमती॑नाम् । छि॒न्धि । व॒टू॒रिणा॑ । प॒दा । म॒हाऽव॑टूरिणा । प॒दा ॥

Mantra without Swara
अभिव्लग्या चिदद्रिवः शीर्षा यातुमतीनाम्। छिन्धि वटूरिणा पदा महावटूरिणा पदा ॥

अभिऽव्लग्य। चित्। अद्रिऽवः। शीर्षा। यातुऽमतीनाम्। छिन्धि। वटूरिणा। पदा। महाऽवटूरिणा। पदा ॥ १.१३३.२

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 2

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Meaning
हे (अद्रिवः) मेघ के समान वर्त्तमान शूरवीर तूँ प्रशंसित बल को (अभिव्लग्य) सब ओर से पाकर (यातुमतीनाम्) जिनमें बहुत हिंसक मार-धार करनेहारे विद्यमान हैं उन सेनाओं के (महावटूरिणा) बड़े-बड़े रङ्ग से युक्त (पदा) चौथे भाग से जैसे (चित्) वैसे (वटूरिणा) लपेटे हुए (पदा) शस्त्रों के चौथे भाग से वा अपने पैर से दबा के (शीर्षा) शत्रुओं के शिरों को (छिन्धि) छिन्न-भिन्न कर ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अपने बल की उन्नति कर शत्रुओं के बलों को छिन्न-भिन्न कर उनको पैर से दबाता है, वह राज्य करने को योग्य होता है ॥ २ ॥
Subject
फिर शत्रुजन कैसे मारने चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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