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Rigveda Mandal 1 / Sukta 132 / Mantra 6

191 Sukta
6 Mantra
1/132/6
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- विराडत्यष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यु॒वं तमि॑न्द्रापर्वता पुरो॒युधा॒ यो न॑: पृत॒न्यादप॒ तंत॒मिद्ध॑तं॒ वज्रे॑ण॒ तंत॒मिद्ध॑तम्। दू॒रे च॒त्ताय॑ च्छन्त्स॒द्गह॑नं॒ यदिन॑क्षत्। अ॒स्माकं॒ शत्रू॒न्परि॑ शूर वि॒श्वतो॑ द॒र्मा द॑र्षीष्ट वि॒श्वत॑: ॥

यु॒वम् । तम् । इ॒न्द्रा॒प॒र्व॒ता॒ । पु॒रः॒ऽयुधा॑ । यः । नः॒ । पृ॒त॒न्यात् । अप॑ । तम्ऽत॑म् । इत् । ह॒त॒म् । वज्रे॑ण । तम्ऽत॑म् । इत् । ह॒त॒म् । दू॒रे । च॒त्ताय॑ । छ॒न्त्स॒त् । गह॑नम् । यत् । इन॑क्षत् । अ॒स्माक॑म् । शत्रू॑न् । परि॑ । शू॒र॒ । वि॒श्वतः॑ । द॒र्मा । द॒र्षी॒ष्ट॒ । वि॒श्वतः॑ ॥

Mantra without Swara
युवं तमिन्द्रापर्वता पुरोयुधा यो न: पृतन्यादप तंतमिद्धतं वज्रेण तंतमिद्धतम्। दूरे चत्ताय च्छन्त्सद्गहनं यदिनक्षत्। अस्माकं शत्रून्परि शूर विश्वतो दर्मा दर्षीष्ट विश्वत: ॥

युवम्। तम्। इन्द्रापर्वता। पुरःऽयुधा। यः। नः। पृतन्यात्। अप। तम्ऽतम्। इत्। हतम्। वज्रेण। तम्ऽतम्। इत्। हतम्। दूरे। चत्ताय। छन्त्सत्। गहनम्। यत्। इनक्षत्। अस्माकम्। शत्रून्। परि। शूर। विश्वतः। दर्मा। दर्षीष्ट। विश्वतः ॥ १.१३२.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरोयुधा) पहिले युद्ध करनेवाले (इन्द्रापर्वता) सूर्य्य और मेघ के समान वर्त्तमान सभा सेनाधीशो ! (युवम्) तुम (यः) जो (नः) हम लोगों की (पृतन्यात्) सेना को चाहे (तम्) उसको (वज्रेण) पैने तीक्ष्ण शस्त्र वा अस्त्र अर्थात् कलाकौशल से बने हुए शस्त्र से (अप, हतम्) अत्यन्त मारो, जैसे तुम दोनों जिस जिसको (हतम्) मारो (तं तम्) उस उसको (इत्) ही हम लोग भी मारें और जिस जिसको हम लोग मारें (तं तम्) उस उसको (इत्) ही तुम मारो। हे (शूर) शूरवीर ! (दर्मा) शत्रुओं को विदीर्ण करते हुए आप जिन (अस्माकम्) हमारे (शत्रून्) शत्रुओं को (विश्वतः) सब ओर से (दर्षीष्ट) दरो विदीर्ण करो, इनको हम लोग भी (विश्वतः) सब ओर से (परि) सब प्रकार दरें विदीर्ण करें, (यत्) जो (चत्ताय) माँगे हुए के लिये (गहनम्) कठिन व्यवहार को (दूरे) दूर में (छन्त्सत्) स्वीकार करे और शत्रुओं की सेना को (इनक्षत्) व्याप्त हो, उसकी तुम निरन्तर रक्षा करो ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सेना पुरुषों को जो सेनापति आदि पुरुषों के शत्रु हैं, वे अपने भी शत्रु जानने चाहिये, शत्रुओं से परस्पर फूट को न प्राप्त हुए धार्मिक जन उन शत्रुओं को विदीर्ण कर प्रजाजनों की रक्षा करें ॥ ६ ॥इस सूक्त में राजधर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ बत्तीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर सेना जन परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।