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Rigveda Mandal 1 / Sukta 131 / Mantra 5

191 Sukta
7 Mantra
1/131/5
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आदित्ते॑ अ॒स्य वी॒र्य॑स्य चर्किर॒न्मदे॑षु वृषन्नु॒शिजो॒ यदावि॑थ सखीय॒तो यदावि॑थ। च॒कर्थ॑ का॒रमे॑भ्य॒: पृत॑नासु॒ प्रव॑न्तवे। ते अ॒न्याम॑न्यां न॒द्यं॑ सनिष्णत श्रव॒स्यन्त॑: सनिष्णत ॥

आत् । इत् । ते॒ । अ॒स्य । वी॒र्य॑स्य । च॒र्कि॒र॒न् । मदे॑षु । वृ॒ष॒न् । उ॒शिजः॑ । यत् । आवि॑थ । स॒खि॒ऽय॒तः । यत् । आवि॑थ । च॒कर्थ॑ । का॒रम् । ए॒भ्यः॒ । पृत॑नासु । प्रऽव॑न्तवे । ते । अ॒न्याम्ऽअ॑न्याम् । न॒द्य॑म् । स॒नि॒ष्ण॒त॒ । श्र॒व॒स्यन्तः॑ । स॒नि॒ष्ण॒त॒ ॥

Mantra without Swara
आदित्ते अस्य वीर्यस्य चर्किरन्मदेषु वृषन्नुशिजो यदाविथ सखीयतो यदाविथ। चकर्थ कारमेभ्य: पृतनासु प्रवन्तवे। ते अन्यामन्यां नद्यं सनिष्णत श्रवस्यन्त: सनिष्णत ॥

आत्। इत्। ते। अस्य। वीर्यस्य। चर्किरन्। मदेषु। वृषन्। उशिजः। यत्। आविथ। सखिऽयतः। यत्। आविथ। चकर्थ। कारम्। एभ्यः। पृतनासु। प्रऽवन्तवे। ते। अन्याम्ऽअन्याम्। नद्यम्। सनिष्णत। श्रवस्यन्तः। सनिष्णत ॥ १.१३१.५

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 20 Mantra » 5

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Meaning
हे (वृषन्) आनन्द को वर्षाते हुए विद्वान् ! (यत्) जो धर्मात्मा जन (ते) आपके (अस्य) इस (वीर्यस्य) पराक्रम के प्रभाव से (मदेषु) आनन्दों में वर्त्तमान (उशिजः) धर्म की कामना करते हुए जन (चर्किरन्) दुष्टों को निरन्तर दूर करें वा (श्रवस्यन्तः) अपने को अन्न की इच्छा करते हुए (प्रवन्तवे) अच्छे विभाग करने को (पृतनासु) मनुष्यों में (सनिष्णत) सेवन करें अर्थात् (अन्यामन्याम्) अलग अलग (नद्यम्) नदी को जैसे मेघ वैसे (कारम्) जो किया जाता उस कार का (सनिष्णत) सेवन करें उन (सखीयतः) मित्र के समान आचरण करते हुए जनों को आप (आविथ) पालो (यत्) जिस कारण जिनको (आविथ) पालो इससे उनको पुरुषार्थवाले (चकर्थ) करो (एभ्यः) इन धार्मिक सज्जनों से सब राज्य की पालना करे और जो आप के कर्मचारी पुरुष हों (ते) वें भी धर्म से (आदित्) ही प्रजाजनों की पालना करें ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रजा की रक्षा करने में अधिकार पाये हुए हैं, वे धर्म के साथ प्रजा पालने की इच्छा करते हुए उत्तम यत्नवान् हों ॥ ५ ॥
Subject
फिर प्रजा की रक्षा करनेहारे क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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