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Rigveda Mandal 1 / Sukta 130 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/130/7
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- निचृदत्यष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
भि॒नत्पुरो॑ नव॒तिमि॑न्द्र पू॒रवे॒ दिवो॑दासाय॒ महि॑ दा॒शुषे॑ नृतो॒ वज्रे॑ण दा॒शुषे॑ नृतो। अ॒ति॒थि॒ग्वाय॒ शम्ब॑रं गि॒रेरु॒ग्रो अवा॑भरत्। म॒हो धना॑नि॒ दय॑मान॒ ओज॑सा॒ विश्वा॒ धना॒न्योज॑सा ॥

भि॒नत् । पुरः॑ । न॒व॒तिम् । इ॒न्द्र॒ । पू॒रवे॑ । दिवः॑ऽदासाय । महि॑ । दा॒शुषे॑ । नृ॒तो॒ इति॑ । वज्रे॑ण । दा॒शुषे॑ । नृ॒तो॒ इति॑ । अ॒ति॒थि॒ऽग्वाय॑ । शम्ब॑रम् । गि॒रेः । उ॒ग्रः । अव॑ । अ॒भ॒र॒त् । म॒हः । धना॑नि । दय॑मानः । ओज॑सा । विश्वा॑ । धना॒नि । ओज॑सा ॥

Mantra without Swara
भिनत्पुरो नवतिमिन्द्र पूरवे दिवोदासाय महि दाशुषे नृतो वज्रेण दाशुषे नृतो। अतिथिग्वाय शम्बरं गिरेरुग्रो अवाभरत्। महो धनानि दयमान ओजसा विश्वा धनान्योजसा ॥

भिनत्। पुरः। नवतिम्। इन्द्र। पूरवे। दिवःऽदासाय। महि। दाशुषे। नृतो इति। वज्रेण। दाशुषे। नृतो इति। अतिथिऽग्वाय। शम्बरम्। गिरेः। उग्रः। अव। अभरत्। महः। धनानि। दयमानः। ओजसा। विश्वा। धनानि। ओजसा ॥ १.१३०.७

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (नृतो) अपने अङ्गों को युद्ध आदि में चलाने वा (नृतो) विद्या की प्राप्ति के लिये अपने शरीर की चेष्टा करने (इन्द्र) और दुष्टों का विनाश करनेवाले ! जो आप (वज्रेण) शस्त्र वा उपदेश से शत्रुओं की (नवतिम्) नब्बे (पुरः) नगरियों को (भिनत्) विदारते नष्ट-भ्रष्ट करते वा (महि) बड़प्पन पाये हुए सत्कारयुक्त (दिवोदासाय) चहीते पदार्थ को अच्छे प्रकार देनेवाले और (दाशुषे) विद्यादान किये हुए (पूरवे) पूरे साधनों से युक्त मनुष्य के लिये सुख को धारण करते तथा (अतिथिग्वाय) अतिथियों को प्राप्त होने और (दाशुषे) दान करनेवाले के लिये (उग्रः) तीक्ष्ण स्वभाव अर्थात् प्रचण्ड प्रतापवान् सूर्य (गिरेः) पर्वत के आगे (शम्बरम्) मेघ को जैसे वैसे (ओजसा) अपने पराक्रम से (महः) बड़े-बड़े (धनानि) धन आदि पदार्थों के (दयमानः) देनेवाले (ओजसा) पराक्रम से (विश्वा) समस्त (धनानि) धनों को (अवाभरत्) धारण करते सो आप किञ्चित् भी दुःख को कैसे प्राप्त होवें ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस मन्त्र में “नवतिम्” यह पद बहुतों का बोध कराने के लिये है। जो शत्रुओं को जीतते, अथितियों का सत्कार करते और धार्मिकों को विद्या आदि गुण देते हुए वर्त्तमान हैं, वे सूर्य्य जैसे मेघ को वैसे समस्त ऐश्वर्य्य धारण करते हैं ॥ ७ ॥
Subject
इस संसार में कौन ऐश्वर्य की उन्नति करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।