Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 130 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/130/6
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- स्वराडष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒मां ते॒ वाचं॑ वसू॒यन्त॑ आ॒यवो॒ रथं॒ न धीर॒: स्वपा॑ अतक्षिषुः सु॒म्नाय॒ त्वाम॑तक्षिषुः। शु॒म्भन्तो॒ जेन्यं॑ यथा॒ वाजे॑षु विप्र वा॒जिन॑म्। अत्य॑मिव॒ शव॑से सा॒तये॒ धना॒ विश्वा॒ धना॑नि सा॒तये॑ ॥

इ॒माम् । ते॒ । वाच॑म् । व॒सु॒ऽयन्तः॑ । आ॒यवः॑ । रथ॑म् । न । धीरः॑ । सु॒ऽअपाः॑ । अ॒त॒क्षि॒षुः॒ । सु॒म्नाय॑ । त्वाम् । अ॒त॒क्षि॒षुः॒ । शु॒म्भन्तः॑ । जेन्य॑म् । यथा॑ । वाजे॑षु । वि॒प्र॒ । वा॒जिन॑म् । अत्य॑म्ऽइव । शव॑से । सा॒तये॑ । धना॑ । विश्वा॑ । धना॑नि । सा॒तये॑ ॥

Mantra without Swara
इमां ते वाचं वसूयन्त आयवो रथं न धीर: स्वपा अतक्षिषुः सुम्नाय त्वामतक्षिषुः। शुम्भन्तो जेन्यं यथा वाजेषु विप्र वाजिनम्। अत्यमिव शवसे सातये धना विश्वा धनानि सातये ॥

इमाम्। ते। वाचम्। वसुऽयन्तः। आयवः। रथम्। न। धीरः। सुऽअपाः। अतक्षिषुः। सुम्नाय। त्वाम्। अतक्षिषुः। शुम्भन्तः। जेन्यम्। यथा। वाजेषु। विप्र। वाजिनम्। अत्यम्ऽइव। शवसे। सातये। धना। विश्वा। धनानि। सातये ॥ १.१३०.६

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (विप्र) मेघावी धीर बुद्धिवाले जन ! जिन (ते) आपके निकट से (इमाम्) इस (वाचम्) विद्या, धर्म और सत्ययुक्त वाणी को प्राप्त (आयवः) विद्वान् जन (वसूयन्तः) अपने को विज्ञान आदि धन चाहते हुए (स्वपाः) जिसके उत्तम धर्म के अनुकूल काम वह (धीरः) धीरपुरुष (रथम्) प्रंशसित रमण करने योग्य रथ को (न) जैसे वैसे (अतिक्षषुः) सूक्ष्मबुद्धि को स्वीकार करें वा (शुम्भन्तः) शोभा को प्राप्त हुए (यथा) जैसे (वाजेषु) संग्रामों में (जेन्यम्) जिससे शत्रुओं को जीतते उस (वाजिनम्) अतिचतुर वा संग्रामयुक्त पुरुष को (अत्यमिव) घोड़ा के समान (शवसे) बल के लिये और (सातये) अच्छे प्रकार विभाग करने के लिये (धनानि) द्रव्य आदि पदार्थों के समान (विश्वा) समस्त (धना) विद्या आदि पदार्थों को प्राप्त होकर (सुम्नाय) सुख और (सातये) संभोग के लिये। (त्वाम्) आपको (अतक्षिषुः) उत्तमता से स्वीकार करें वा अपने गुणों से ढाँपें, वे सुखी होते हैं ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो उपदेश करनेवाले धर्मात्मा विद्वान् जन से समस्त विद्याओं को पाकर विस्तारयुक्तबुद्धि अर्थात् सब विषयों में बुद्धि फैलानेहारे होते हैं, वे समग्र ऐश्वर्य को पाकर, रथ, घोड़ा और धीर पुरुष के समान धर्म के अनुकूल मार्ग को प्राप्त होकर कृतकृत्य होते हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर मनुष्य किससे क्या पाकर कैसे होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।