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Rigveda Mandal 1 / Sukta 130 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/130/4
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- अष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
दा॒दृ॒हा॒णो वज्र॒मिन्द्रो॒ गभ॑स्त्यो॒: क्षद्मे॑व ति॒ग्ममस॑नाय॒ सं श्य॑दहि॒हत्या॑य॒ सं श्य॑त्। सं॒वि॒व्या॒न ओज॑सा॒ शवो॑भिरिन्द्र म॒ज्मना॑। तष्टे॑व वृ॒क्षं व॒निनो॒ नि वृ॑श्चसि पर॒श्वेव॒ नि वृ॑श्चसि ॥

दा॒दृ॒हा॒णः । वज्र॑म् । इन्द्रः॑ । गभ॑स्त्योः । क्षद्म॑ऽइव । ति॒ग्मम् । अस॑नाय । सम् । श्य॒त् । अ॒हि॒ऽहत्या॑य । सम् । श्य॒त् । स॒म्ऽवि॒व्या॒नः । ओज॑सा । शवः॑ऽभिः । इ॒न्द्र॒ । म॒ज्मना॑ । तष्टा॑ऽइव । वृ॒क्षम् । व॒निनः॑ । नि । वृ॒श्च॒सि॒ । प॒र॒श्वाऽइ॑व । नि । वृ॒श्च॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
दादृहाणो वज्रमिन्द्रो गभस्त्यो: क्षद्मेव तिग्ममसनाय सं श्यदहिहत्याय सं श्यत्। संविव्यान ओजसा शवोभिरिन्द्र मज्मना। तष्टेव वृक्षं वनिनो नि वृश्चसि परश्वेव नि वृश्चसि ॥

दादृहाणः। वज्रम्। इन्द्रः। गभस्त्योः। क्षद्मऽइव। तिग्मम्। असनाय। सम्। श्यत्। अहिऽहत्याय। सम्। श्यत्। सम्ऽविव्यानः। ओजसा। शवःऽभिः। इन्द्र। मज्मना। तष्टाऽइव। वृक्षम्। वनिनः। नि। वृश्चसि। परश्वाऽइव। नि। वृश्चसि ॥ १.१३०.४

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 18 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! आप जैसे सूर्य (अहिहत्याय) मेघ के मारने को (तिग्मम्) तीव्र अपने किरणरूपी वज्र को (सं, श्यत्) तीक्ष्ण करता वैसे (गभस्त्योः) अपनी भुजाओं के (क्षद्मेव) जल के समान (असनाय) फेंकने के लिये तीव्र (वज्रम्) शस्त्र को निरन्तर धारण करके (दादृहाणः) दोषों का विनाश करते (इन्द्रः) और विद्वान् होते हुए शत्रुओं को (सं, श्यत्) अति सूक्ष्म करते अर्थात् उनका विनाश करते वा हे (इन्द्र) दुष्टों का दोष नाशनेवाले ! आप (वृक्षम्) वृक्ष को (मज्मना) बल से (तष्टेव) जैसे बढ़ई आदि काटनेहारा वैसे (ओजसा) पराक्रम और (शवोभिः) सेना आदि बलों के साथ (संविव्यानः) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हुए (वनिनः) वन वा बहुत किरणें जिनके विद्यमान उनके समान दोषों को (नि, वृश्चसि) निरन्तर काटते वा (परश्वेव) जैसे फरसा से कोई पदार्थ काटता वैसे अविद्या अर्थात् मूर्खपन को अपने ज्ञान से (नि, वृश्चसि) काटते हो, वैसे हम लोग भी करें ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रमाद और आलस्य आदि दोषों को अलग कर संसार में गुणों को निरन्तर धारण करते हैं, वे सूर्य की किरणों के समान यहाँ अच्छी शोभा को प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
इस संसार में कौन अच्छी शोभा को प्राप्त होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।