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Rigveda Mandal 1 / Sukta 130 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/130/3
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- स्वराडष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अवि॑न्दद्दि॒वो निहि॑तं॒ गुहा॑ नि॒धिं वेर्न गर्भं॒ परि॑वीत॒मश्म॑न्यन॒न्ते अ॒न्तरश्म॑नि। व्र॒जं व॒ज्री गवा॑मिव॒ सिषा॑स॒न्नङ्गि॑रस्तमः। अपा॑वृणो॒दिष॒ इन्द्र॒: परी॑वृता॒ द्वार॒ इष॒: परी॑वृताः ॥

अवि॑न्दत् । दि॒वः । निऽहि॑तम् । गुहा॑ । नि॒धि॑म् । वेः । न । गर्भ॑म् । परि॑ऽवीतम् । अश्म॑नि । अ॒न॒न्ते । अ॒न्तः । अश्म॑नि । व्र॒जम् । व॒ज्री । गवा॑म्ऽइव । सिसा॑सन् । अङ्गि॑रःऽतमः । अप॑ । अ॒वृ॒णो॒त् । इषः॑ । इन्द्रः॑ । परि॑ऽवृताः । द्वारः॑ । इषः॑ । परि॑ऽवृताः ॥

Mantra without Swara
अविन्दद्दिवो निहितं गुहा निधिं वेर्न गर्भं परिवीतमश्मन्यनन्ते अन्तरश्मनि। व्रजं वज्री गवामिव सिषासन्नङ्गिरस्तमः। अपावृणोदिष इन्द्र: परीवृता द्वार इष: परीवृताः ॥

अविन्दत्। दिवः। निऽहितम्। गुहा। निधिम्। वेः। न। गर्भम्। परिऽवीतम्। अश्मनि। अनन्ते। अन्तः। अश्मनि। व्रजम्। वज्री। गवाम्ऽइव। सिसासन्। अङ्गिरःऽतमः। अप। अवृणोत्। इषः। इन्द्रः। परिऽवृताः। द्वारः। इषः। परिऽवृताः ॥ १.१३०.३

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (वज्री) शासना के लिये दण्ड धारण किये हुए (व्रजं, गवामिव) जैसे गौओं के समूह गोशाला में गमन करते जाते-आते वैसे (सिषासन्) जनों को ताड़ना देने अर्थात् दण्ड देने की इच्छा करता हुआ अथवा जैसे (अङ्गिरस्तमः) अति श्रेष्ठ (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् सूर्य (इषः) इच्छा करने योग्य (परीवृताः) अन्धकार से ढँपी हुई वीथियों को खोले वैसे (परीवृताः) ढपी हुई (इषः) इच्छाओं और (द्वारः) द्वारों को (अपावृणोत्) खोले तथा (अनन्ते) देश, काल, वस्तु भेद से न प्रतीत होते हुए (अश्मनि) आकाश में (अश्मनि) वर्त्तमान मेघ के (अन्तः) बीच (परिवीतम्) सब ओर से व्याप्त और अति मनोहर जल वा (वेः) पक्षी के (गर्भम्) गर्भ के (न) समान (गुहा) बुद्धि में (निहितम्) स्थित (निधिम्) जिसमें निरन्तर पदार्थ धरे जायें, उस निधिरूप परमात्मा को (दिवः) विज्ञान के प्रकाश से (अविदन्त्) प्राप्त होता है, वह अतुल सुख को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो योग के अङ्ग, धर्म, विद्या और सत्सङ्ग के अनुष्ठान से अपनी आत्मा में स्थित परमात्मा को जानें, वे सूर्य जैसे अन्धकार को वैसे अपने सङ्गियों की अविद्या छुड़ा विद्या के प्रकाश को उत्पन्न कर सबको मोक्षमार्ग में प्रवृत्त कराके उन्हें आनन्दित कर सकते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर कौन परमात्मा को जान सकते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।