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Rigveda Mandal 1 / Sukta 130 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/130/2
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- स्वराडष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पिबा॒ सोम॑मिन्द्र सुवा॒नमद्रि॑भि॒: कोशे॑न सि॒क्तम॑व॒तं न वंस॑गस्तातृषा॒णो न वंस॑गः। मदा॑य हर्य॒ताय॑ ते तु॒विष्ट॑माय॒ धाय॑से। आ त्वा॑ यच्छन्तु ह॒रितो॒ न सूर्य॒महा॒ विश्वे॑व॒ सूर्य॑म् ॥

पिब॑ । सोम॑म् । इ॒न्द्र॒ । सु॒वा॒नम् । अद्रि॑ऽभिः । कोशे॑न । सि॒क्तम् । अ॒व॒तम् । न । वंस॑गः । त॒तृ॒षा॒णः । न । वंस॑गः । मदा॑य । ह॒र्य॒ताय॑ । ते॒ । तु॒विःऽत॑माय॒ । धाय॑से । आ । त्वा॒ । य॒च्छ॒न्तु॒ । ह॒रितः॑ । न । सूर्य॑म् । अहा॑ । विश्वा॑ऽइव । सूर्य॑म् ॥

Mantra without Swara
पिबा सोममिन्द्र सुवानमद्रिभि: कोशेन सिक्तमवतं न वंसगस्तातृषाणो न वंसगः। मदाय हर्यताय ते तुविष्टमाय धायसे। आ त्वा यच्छन्तु हरितो न सूर्यमहा विश्वेव सूर्यम् ॥

पिब। सोमम्। इन्द्र। सुवानम्। अद्रिऽभिः। कोशेन। सिक्तम्। अवतम्। न। वंसगः। ततृषाणः। न। वंसगः। मदाय। हर्यताय। ते। तुविःऽतमाय। धायसे। आ। त्वा। यच्छन्तु। हरितः। न। सूर्यम्। अहा। विश्वाऽइव। सूर्यम् ॥ १.१३०.२

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) सभापति ! (तातृषाणः) अतीव पियासे (वंसगः) बैल के (न) समान बलिष्ठ (वंसगः) अच्छे विभाग करनेवाले आप (अद्रिभिः) शिलाखण्डों से (सुवानम्) निकालने के योग्य (कोशेन) मेघ से (अवतम्) बढ़े (सिक्तम्) और संयुक्त किये हुए के (न) समान (सोमम्) सुन्दर ओषधियों के रस को (पिब) अच्छे प्रकार पिओ (तुविष्टमाय) अतीव बहुत प्रकार (धायसे) धारणा करनेवाले (मदाय) आनन्द के लिये (हर्य्यताय) और कामना किये हुए (ते) आपके लिये यह दिव्य ओषधियों का रस प्राप्त होवे अर्थात् चाहे हुए (सूर्यम्) सूर्य को (अहा) (विश्वेव) सब दिन जैसे वा (सूर्यम्) सूर्यमण्डल को (हरितः) दिशा-विदिशा (न) जैसे वैसे (त्वा) आपको जो लोग (आ, यच्छन्तु) अच्छे प्रकार निरन्तर ग्रहण करें, वे सुख को प्राप्त होवें ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बड़े साधन और छोटे साधनों और आयुर्वेद अर्थात् वैद्यकविद्या की रीति से बड़ी-बड़ी ओषधियों के रसों को बनाकर उसका सेवन करते, वे आरोग्यवान् होकर प्रयत्न कर सकते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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