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Rigveda Mandal 1 / Sukta 13 / Mantra 8

191 Sukta
12 Mantra
1/13/8
Devata- दैव्यौ होतारौ, प्रचेतसौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता सु॑जि॒ह्वा उप॑ह्वये॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी। य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मम्॥

ता । सु॒ऽजि॒ह्वौ । उप॑ । ह्व॒ये॒ । होता॑रा । दैव्या॑ । क॒वी इति॑ । य॒ज्ञम् नः॒ । य॒क्ष॒ता॒म् । इ॒मम् ॥

Mantra without Swara
ता सुजिह्वा उपह्वये होतारा दैव्या कवी। यज्ञं नो यक्षतामिमम्॥

ता। सुऽजिह्वौ। उप। ह्वये। होतारा। दैव्या। कवी इति। यज्ञम् नः। यक्षताम्। इमम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 2

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Meaning
मैं क्रियाकाण्ड का अनुष्ठान करनेवाला इस घर में जो (नः) हमारे (इमम्) प्रत्यक्ष (यज्ञम्) हवन वा शिल्पविद्यामय यज्ञ को (यक्षताम्) प्राप्त करते हैं, उन (सुजिह्वौ) सुन्दर पूर्वोक्त सात जीभवाले (होतारा) पदार्थों का ग्रहण करने (कवी) तीव्र दर्शन देने और (दैव्या) दिव्य पदार्थों में रहनेवाले प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध अग्नियों को (उपह्वये) उपकार में लाता हूँ॥८॥
Essence
जैसे एक बिजुली वेग आदि अनेक गुणवाला अग्नि है, इसी प्रकार प्रसिद्ध अग्नि भी है। तथा ये दोनों सकल पदार्थों के देखने में और अच्छे प्रकार क्रियाओं में नियुक्त किये हुए शिल्प आदि अनेक कार्य्यों की सिद्धि के हेतु होते हैं। इसलिये इन्हों से मनुष्यों को सब उपकार लेने चाहियें॥८॥
Subject
अब अगले मन्त्र में उन अग्नियों का उपदेश किया है कि जो शुद्ध करनेवाले विद्युद्रूप से अप्रसिद्ध और प्रत्यक्ष स्थूलरूप से प्रसिद्ध हैं-

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