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Rigveda Mandal 1 / Sukta 13 / Mantra 5

191 Sukta
12 Mantra
1/13/5
Devata- बर्हिः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स्तृ॒णी॒त ब॒र्हिरा॑नु॒षग्घृ॒तपृ॑ष्ठं मनीषिणः। यत्रा॒मृत॑स्य॒ चक्ष॑णम्॥

स्तृ॒णी॒त । ब॒र्हिः । आ॒नु॒षक् । घृ॒तऽपृ॑ष्ठम् । म॒नी॒षि॒णः॒ । यत्र॑ । अ॒मृत॑स्य । चक्ष॑णम् ॥

Mantra without Swara
स्तृणीत बर्हिरानुषग्घृतपृष्ठं मनीषिणः। यत्रामृतस्य चक्षणम्॥

स्तृणीत। बर्हिः। आनुषक्। घृतऽपृष्ठम्। मनीषिणः। यत्र। अमृतस्य। चक्षणम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मनीषिणः) बुद्धिमान् विद्वानो ! (यत्र) जिस अन्तरिक्ष में (अमृतस्य) जलसमूह का (चक्षणम्) दर्शन होता है, उस (आनुषक्) चारों ओर से घिरे और (घृतपृष्ठम्) जल से भरे हुए (बर्हिः) अन्तरिक्ष को (स्तृणीत) होम के धूम से आच्छादन करो, उसी अन्तरिक्ष में अन्य भी बहुत पदार्थ जल आदि को जानो॥५॥
Essence
विद्वान् लोग अग्नि में जो घृत आदि पदार्थ छोड़ते हैं, वे अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर वहाँ के ठहरे हुए जल को शुद्ध करते हैं, और वह शुद्ध हुआ जल सुगन्धि आदि गुणों से सब पदार्थों को आच्छादन करके सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है॥५॥
Subject
फिर वह भौतिक अग्नि उक्त प्रकार से क्रिया में युक्त किया हुआ क्या करता है, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है-