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Rigveda Mandal 1 / Sukta 13 / Mantra 3

191 Sukta
12 Mantra
1/13/3
Devata- नराशंस: Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नरा॒शंस॑मि॒ह प्रि॒यम॒स्मिन्य॒ज्ञ उप॑ह्वये। मधु॑जिह्वं हवि॒ष्कृत॑म्॥

नरा॒शंस॑म् । इ॒ह । प्रि॒यम् । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । उप॑ । ह्व॒ये॒ । मधु॑ऽजिह्वम् । ह॒विः॒ऽकृत॑म् ॥

Mantra without Swara
नराशंसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञ उपह्वये। मधुजिह्वं हविष्कृतम्॥

नराशंसम्। इह। प्रियम्। अस्मिन्। यज्ञे। उप। ह्वये। मधुऽजिह्वम्। हविःऽकृतम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
मैं (अस्मिन्) इस (यज्ञे) अनुष्ठान करने योग्य यज्ञ तथा (इह) संसार में (हविष्कृतम्) जो कि होम करने योग्य पदार्थों से प्रदीप्त किया जाता है और (मधुजिह्वम्) जिसकी काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरूपी ये अति प्रकाशमान चपल ज्वालारूपी जीभें हैं (प्रियम्) जो सब जीवों को प्रीति देने और (नराशंसम्) जिस सुख की मनुष्य प्रशंसा करते हैं, उसके प्रकाश करनेवाले अग्नि को (उपह्वये) समीप प्रज्वलित करता हूँ॥३॥
Essence
जो भौतिक अग्नि इस संसार में होम के निमित्त युक्ति से ग्रहण किया हुआ प्राणियों की प्रसन्नता करानेवाला है, उस अग्नि की सात जीभें हैं अर्थात् काली जो कि सुपेद आदि रङ्ग का प्रकाश करनेवाली, कराली-सहने में कठिन, मनोजवा-मन के समान वेगवाली, सुलोहिता-जिसका उत्तम रक्तवर्ण है, सुधूम्रवर्णा-जिसका सुन्दर धुमलासा वर्ण है, स्फुलिङ्गिनी-जिससे बहुत से चिनगे उठतें हों तथा विश्वरूपी-जिसका सब रूप हैं। ये देवी अर्थात् अतिशय करके प्रकाशमान और लेलायमाना-प्रकाश से सब जगह जानेवाली सात प्रकार की जिह्वा हैं अर्थात् सब पदार्थों को ग्रहण करनेवाली होती हैं। इस उक्त सात प्रकार की अग्नि की जीभों से सब पदार्थों में उपकार लेना मनुष्यों को चाहिये॥३॥
Subject
अब अगले मन्त्र में मनुष्यों के प्रशंसा करने योग्य भौतिक अग्नि के गुणों का उपदेश किया है-