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Rigveda Mandal 1 / Sukta 13 / Mantra 2

191 Sukta
12 Mantra
1/13/2
Devata- तनूनपात् Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मधु॑मन्तं तनूनपाद्य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ नः कवे। अ॒द्या कृ॑णुहि वी॒तये॑॥

मधु॑ऽमन्तम् । त॒नू॒ऽन॒पा॒त् । य॒ज्ञम् । दे॒वेषु॑ । नः॒ । क॒वे॒ । अ॒द्य । कृ॒णु॒हि॒ । वी॒तये॑ ॥

Mantra without Swara
मधुमन्तं तनूनपाद्यज्ञं देवेषु नः कवे। अद्या कृणुहि वीतये॥

मधुऽमन्तम्। तनूऽनपात्। यज्ञम्। देवेषु। नः। कवे। अद्य। कृणुहि। वीतये॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
जो (तनूनपात्) शरीर तथा ओषधि आदि पदार्थों के छोटे-छोटे अंशों का भी रक्षा करने और (कवे) सब पदार्थों का दिखलानेवाला अग्नि है, वह (देवेषु) विद्वानों तथा दिव्यपदार्थों में (वीतये) सुख प्राप्त होने के लिये (अद्य) आज (नः) हमारे (मधुमन्तम्) उत्तम-उत्तम रसयुक्त (यज्ञम्) यज्ञ को (कृणुहि) निश्चित करता है॥२॥
Essence
जब अग्नि में सुगन्धि आदि पदार्थों का हवन होता है, तभी वह यज्ञ वायु आदि पदार्थों को शुद्ध तथा शरीर और ओषधि आदि पदार्थों की रक्षा करके अनेक प्रकार के रसों को उत्पन्न करता है, तथा वह यज्ञ उन शुद्ध पदार्थों के भोग से प्राणियों के विद्या ज्ञान और बल की वृद्धि भी होती है॥२॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में शरीर आदि की रक्षा करनेवाले भौतिक अग्नि के गुण वर्णन किये हैं-

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