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Rigveda Mandal 1 / Sukta 13 / Mantra 11

191 Sukta
12 Mantra
1/13/11
Devata- वनस्पतिः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अव॑ सृजा वनस्पते॒ देव॑ दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः। प्र दा॒तुर॑स्तु॒ चेत॑नम्॥

अव॑ । सृ॒ज॒ । व॒न॒स्प॒ते॒ । देव॑ । दे॒वेभ्यः॑ । ह॒विः । प्र । दा॒तुः । अ॒स्तु॒ । चेत॑नम् ॥

Mantra without Swara
अव सृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः। प्र दातुरस्तु चेतनम्॥

अव। सृज। वनस्पते। देव। देवेभ्यः। हविः। प्र। दातुः। अस्तु। चेतनम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (देव) फल आदि पदार्थों को देनेवाला (वनस्पतिः) वनों के वृक्ष और ओषधि आदि पदार्थों को अधिक वृष्टि के हेतु से पालन करनेवाला (देवेभ्यः) दिव्यगुणों के लिये (हविः) हवन करने योग्य पदार्थों को (अवसृज) उत्पन्न करता है, वह (प्रदातुः) सब पदार्थों की शुद्धि चाहनेवाले विद्वान् जन के (चेतनम्) विज्ञान को उत्पन्न करानेवाला (अस्तु) होता है॥
Essence
मनुष्यों ने पृथिवी तथा सब पदार्थ जलमय युक्ति से क्रियाओं में युक्त किये हुए अग्नि से प्रदीप्त होकर रोगों की निर्मूलता से बुद्धि और बल को देने के कारण ज्ञान के बढ़ाने के हेतु होकर दिव्यगुणों का प्रकाश करते हैं॥११॥
Subject
वह अग्नि किससे प्रज्वलित हुआ इन कार्य्यों को सिद्ध करता है, इसका उपदेश अगले मन्त्र में किया है-