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Rigveda Mandal 1 / Sukta 129 / Mantra 9

191 Sukta
11 Mantra
1/129/9
Devata- इन्द्र: Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhanda- स्वराट्शक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं न॑ इन्द्र रा॒या परी॑णसा या॒हि प॒थाँ अ॑ने॒हसा॑ पु॒रो या॑ह्यर॒क्षसा॑। सच॑स्व नः परा॒क आ सच॑स्वास्तमी॒क आ। पा॒हि नो॑ दू॒रादा॒राद॒भिष्टि॑भि॒: सदा॑ पाह्य॒भिष्टि॑भिः ॥

त्वम् । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । रा॒या । परी॑णसा । या॒हि । प॒था । अ॒ने॒हसा॑ । पु॒रः । या॒हि । अ॒र॒क्षसा॑ । सच॑स्व । नः । प॒रा॒के । आ । सच॑स्व । अ॒स्त॒म्ऽई॒के । आ । पा॒हि । नः॒ । दू॒रात् । आ॒रात् । अ॒भिष्टि॑ऽभिः । सदा॑ । पा॒हि॒ । अ॒भिष्टि॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
त्वं न इन्द्र राया परीणसा याहि पथाँ अनेहसा पुरो याह्यरक्षसा। सचस्व नः पराक आ सचस्वास्तमीक आ। पाहि नो दूरादारादभिष्टिभि: सदा पाह्यभिष्टिभिः ॥

त्वम्। नः। इन्द्र। राया। परीणसा। याहि। पथा। अनेहसा। पुरः। याहि। अरक्षसा। सचस्व। नः। पराके। आ। सचस्व। अस्तम्ऽईके। आ। पाहि। नः। दूरात्। आरात्। अभिष्टिऽभिः। सदा। पाहि। अभिष्टिऽभिः ॥ १.१२९.९

Ashtak » 2 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विद्या वा ऐश्वर्ययुक्त विद्वान् ! (त्वम्) आप (परीणसा) बहुत (राया) धन से (नः) हम लोगों को (याहि) प्राप्त हो और (अनेहसः) रक्षामय जो धर्म उससे (अरक्षसा) और जिसमें दुष्ट प्राणी विद्यमान नहीं उस (पथा) मार्ग से (पुरः) प्रथम जो वर्त्तमान उनको (याहि) प्राप्त हो और (नः) हमको (पराके) दूर देश में (आ, सचस्व) अच्छे प्रकार प्राप्त होओ मिलो और (अस्तमीके) समीप में हम लोगों को (आ, सचस्व) अच्छे प्रकार मिलो और जो (अभिष्टिभिः) सब ओर से क्रियाओं से सङ्ग करते उन (दूरात्) दूर और (आरात्) समीप से (नः) हम लोगों की (पाहि) रक्षा करो और (सदा) सब कभी (अभिष्टिभिः) सब ओर से चाही हुई क्रियाओं से हम लोगों की (पाहि) रक्षा करो ॥ ९ ॥
Essence
उपदेशकों को चाहिये कि धर्म के अनुकूल मार्ग से आप प्रवृत्त हों और सबको प्रवृत्त करा कर अपने उपदेश के द्वारा समीपस्थ और दूरस्थ पदार्थों का सङ्ग कर भ्रम मिटाने और सत्यविज्ञान की प्राप्ति कराने से सबकी निरन्तर अच्छी रक्षा करें ॥ ९ ॥
Subject
फिर उपदेश करनेवालों को कैसे बर्त्ताव रखना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।